नहीं तुम अपमान करो
नारी का सम्मान करो
बो क्यारी है प्रेम की
तुम पुष्प अंकुरित उसी के
उसी से होकर पलवित तुम ने
गए है गीत ख़ुशी के...
मूरत है वो त्याग की
उसके त्याग का अभिमान करो
नहीं तुम अपमान करो
नारी का सम्मान करो...
छोड़ घर-द्वार सब अपना
लगी पूर्ण करने बो तेरा सपना
उन सपनो में उसकी भी जुडी हैं
छोटी-मौटीसी कड़ियाँ
उन कड़ियों का ध्यान धरो
उसकी इच्छाओ का भी मान करो
नहीं तुम अपमान करो
नारी का सम्मान करो...
देवेन्द्र "सागर"

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