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Monday, September 22, 2014

बेचारा पति

~~बेचारा पति~~
झाड़ू लगबाले, पूछा लगबाले
बर्तन भी धुलबाऊगा, पति हूँ तेरा
पति ही कहलाउगा.....

आटा गुन्दबाले, रोटी सिकबाले
सब्जी भी बनाउगा, पति हूँ तेरा
पति ही कहलाउगा....

बच्चो को नहलबाले, कपडे भी धुलबाले
तुझको भी नहलबाउगा, पति हूँ तेरा
पति ही कहलाऊगा....

हाथ भी दबबाले, पैर भी दबबाले
लोरी गाके सुलाउगा, पर ये न भूल
पति हूँ तेरा पति ही कहलाउगा.....

घर में कर लाख अत्याचार
बहार तो मैं ही रॉब दिखाउगा
क्यों की पति हूँ तेरा
पति ही कहलाउगा......

देवेन्द्र "सागर"
22/09/2014


Thursday, September 18, 2014

यूँ ही तड़फता रहे


गर किस्मत में नहीं तू मेरे लिए
फिर क्यूँ धडकता है दिल तेरे लिए....

तेरी धड़कनो को अहसास नहीं मेरा
फिर क्यूँ तड़फता है दिल तेरे लिए....

लवो से जब कोई नाम ले जो तेरा
तो क्यूँ भड़कता है दिल तेरे लिए....

गर तड़फना ही है महोब्बत की तासीर
तो तड़फता रहे यूँही मेरा दिल तेरे लिए...

देवेन्द्र "सागर"
१८/०९/२०१४


Monday, September 15, 2014

"हिन्दी"

           "हिन्दी"


देखो हिन्दुस्तान में
हिन्दी का दुर्भाग्य
खुद के अस्तित्व के लिए
लड़ना पड़ रहा है......
हिन्दुस्तान में ही हिन्दी दिवस
मनाना पढ़ रहा है....
दिखाने खुद को विद्ध्यवान
क्यूँ हिन्दी के बीच में
अंग्रेजी जड़ रहा है......
रोता हिन्दी में,,,
हँसता हिन्दी में,,
सोचता हिन्दी में, फिर क्यूँ
बिन अंग्रेजी खुद को
तुक्ष समझ रहा है....
आज पूरा विश्व लगा देवगिरी लिपी
पर शोध करने
ऐ मूर्ख फिर क्यूँ तू
हिन्दी से डर रहा है......
और क्यूँ अंतरमन से
अंग्रेजी के लिए झगड़ रहा है.......
नारी का श्रंगार पूर्ण हो
लगाकर बिन्दी....
तुम भी बन जाओ पूर्ण
हिन्दुस्तानी हस्ताक्षर कर हिन्दी...
जय हिन्द जय हिन्दी

देवेन्द्र "सागर"
१४-०९-२०१४

Wednesday, September 10, 2014

खुबसूरत नागिन

कास में ना करता उससे महोब्बत
ना बो मेरे दिल में बस्ती.......

ना होता मैं उसका दीवाना
ना बो नागिन बन कर डसती.....

बो एक खूबसूरत नागिन ही थी
जिसने करके मेरी जिन्दगी बीरन

ऐसे बना दिया जैसे जिन्दगी हो
"सागर" में डूबती कश्ती....

देवेन्द्र "सागर"

Tuesday, September 9, 2014

तुम तुम्ही हो या और कोई

जिन को देखा करते थे ख्बाबो में
मालूम नहीं तुम बो ही ही या और कोई

जो अप्सरा सोते से जगाती थी स्वप्न में
मालूम नहीं तुम बो ही हो या और कोई

कल्पनाओ के ताने-बाने बुना करते थे मन में
मालूम नहीं तुम बोही हो या और कोई

जिन के लिए हर पल बेचेन रहा करते थे
मालूम नहीं तुम बो ही हो या और कोई

दिल चाहता है तुम्हे देखते रहे हर दम
कोई भी हो बड़ी कमसिन हो तुम

देख कर आँखों पर यकीन ना रहा
मालूम नहीं तुम तुम्ही हो या और कोई...

देवेंन्द्र "सागर"
06/10/1995