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Saturday, July 6, 2019

पत्थरो से टकरा के रुक जाए बो धारा नही हूँ
लडूंगा ज़िन्दगी  तुझसे, मैं  अभी हारा नही हूँ

कितना भी उजड़े आशियाना फिर बसाउंगा
डर के तुझसे रुक जाए, बो  बंजारा नही हूँ

दिए हें कष्ट बहुत, ऐ जिन्दगी तूने मुझको
हँस कर  सहे-सहूँगा  पर दुख्यारा नही हूँ

सौख है घूमता हूँ बादियों में खुले आसमा तले
हाँ प्रकृति प्रेमी हूँ पर कोई आबारा नही हूँ

छोड़  दिया बीच  मझधार  में सफर बाँकी है
लगा सके ना पार साहिल,बो किनारा नही हूँ

उतर कर देखो  मुझ में, प्यार का "सागर" हूँ
बुझेगी प्यास समन्दर का पानी खारा नही हूँ

देवेन्द्र सगर "सागर"
प्रकाशित
भावनाओं का सागर

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