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Saturday, May 31, 2014

बाल मजदूरी



कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
चाहते है हम भी सुन्दर बन कर रहना
पर इच्छाओ को कर के दमन
उन से लड़ना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

ढोकर कचरा पैसे लाते
बापू उन्हें सराब में उड़ाते
ढोने कचरा जिस दिन नहीं जाते
मार उनकी खूब सहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

माँ मेरे बापू से खूब पिटती है
जवानी में ही बुढ़ीसी लगती है
बो भी घर-घर वर्तन धोती है
दिनभर करती कम रातभर रोती है
फिर भी साथ बापू के रहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

लाती माँ दो पैसे भूख मिटाने को
उस से भी चूल्हा जलता नहीं
तब इच्छाओ की आहूति देकर
जिस्म जलाना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पढता है

कोई आता नहीं मेरे बापू को समझाने
कोपी किताब और बस्ता मुझे दिलाने
समझता नहीं कोई मेरी बाल इच्छाओ को
मैं भी जीना चाहती हूँ तुम्हारी तराह कहना पढता है
कचरा ढोना काम नहीं गबारा मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

गरीबो के यहाँ तो मैं पैदा हो भी जाती हूँ
अमीरों के यहाँ तो कोख में ही मरना पड़ता है
जिन्दगी यूँ ही निकलती समझोतो में
बेटी हूँ इस लिऐ मुझे सब सहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पढता है......

देवेन्द्र "सागर"
३१-०५-२०१४



Monday, May 26, 2014

धड़कन




      हमने तो सिर्फ तुम्हारी धडकनों में जिया है..।
      पर क्या करे महसूस आपने आज किया है..।।
      २६-०५-०१४

      मेरी धडकनों में हे तू, अहसास तो कर..।
      तुझ में मैं मुझ में सिर्फ तू विश्वास तो कर..

      देवेन्द्र "सागर"
      २४-०५-२०१४


Saturday, May 24, 2014

~तेरा चहरा~


लगता है कितना भोला कितना प्यारा
पर है नहीं इतना माशूम तेरा चहरा

जताती हो प्यार जो बेसुमार हमपर
जानते है इसमें फरेब छुपा बहुत गहरा

कैसे समझू तुझको तेरी महोब्बत को
हर तरफ लगा रखा है साजिसो का पहरा

जो तीर दागे तूने नफरतो के प्यार से
किस को दिखाऊ बो जख्म दिया हुआ तेरा

"सागर" दाग-ऐ-दिल धोए कैसे..?
मेरी आँखों का पानी आँखों में ठहरा

देवेंन्द्र "सागर"


Friday, May 23, 2014

"फूल पलाश का"

"फूल पलाश का"

आफताब की चिलचिलाती धूप
घबरा जाते है सभी देख गर्मी मै
ज्वलित तपिस रूप
डर से उसके डर जाते है
नहीं जो सामना करपाते है
सूख जाते है बो पत्ते-पत्ते और वृछ
टिकना पाते उसके समक्ष
आफताब की ज्वाला में जलजाते
न जाने ऐसे कितने वृछ
जो उस से डटकर लड़ता है
जो उसकी ज्वाला में जलकर खिलता है
संघर्षो में भी मुस्कुराना
है जिसका सिद्धांत मूल
वो वृछ पलाश और उसका फूल
प्रकर्ति हमे सिखाती है
जीवन एक संघर्ष है
संघर्षो से न घबराना
जीवन की तपिस में बन फूल पलाश
तुम खिलते ही जाना, खिलते ही जाना.....

देवेन्द्र "सागर"