Followers

Friday, June 20, 2014

~~प्यार में दर्द बहुत है~~



जो कहते है हमसे प्यार बहुत
बो देते है हमको दर्द बहुत
साथ रहते है बो हमारे 'हरदम'
फिर भी हमेशा है दूर बहुत

उतारा नहीं हमे कभी दिल के पैमाने में
बिन पिये कह दिया साकी कडबा तेरा जाम बहुत
हमे देख कर दर्द में, आता है उन्हें मजा बहुत
हँसता मैं रोता दिल, ऐ दिल्लगी की सजा बहुत

चलते है बो पकड़ कर हाथ मेरे साथ
बिखेरते हुए कांटे इन काँटों की चुभन बहुत
कैसे कटेगा जिन्दगी का ऐ सफर
बाँकी अभी गुमनाम रहो पर सफर बहुत

देवेन्द्र "सागर"
१९/०६/२०१४


Tuesday, June 17, 2014

मेरे पास नहीं है पापा

जब भी सुनता हूँ 
दो अक्षर 'पा''पा'
गूंज कर अंतरमन में
विलीन हो जाते है
क्या है इन अक्षरों की
सार्थकता....?
बस मैं ढूंढता रहजाता हूँ
और सुनकर इन अक्षरों को
भावविभोर हो जाता हूँ
एक धुंदली सी तस्वीर
ऊँगली पकड़ के घुमाते हुऐ
उभर आती है कभी भी
हिर्दय पटल पर 
जो कभी देखी होगी
नन्ही सी आँखों ने
कर जाती हैं मुझे निशब्द
क्या है "पापा"....?
मैं नही कह सकता
क्योकि मेरे पास नहीं है "पापा"

   

देवेन्द्र "सागर"

17/06/2014

Friday, June 13, 2014

~~वृक्ष~~


~~वृक्ष~~

ना काटो मुझे भी दर्द होता है
जीवन मुझसे ही है
जीवन मुझ में भी है
दिल मेरा भी रोता है
रक्त मेरा भी बहता है
रक्त्वाह्नियों से
क्यूँ जुदा करते हो मुझे
मेरी ही टहनियों से
मेने बचपन देखा है
तेरे दादा का
वो अल्हड़पन, लड़कपन
तेरे पापा का
डालकर मुझ पर झुला
तुझ को खूब झुलाया
जब खेल-खेल कर थका तू
तब देकर सीतल समीर मेने
तुझ को ख़ूब सुलाया
सूरज ने मोसम को तपिस से अपनी
जब-जब गरमाया
तब-तब बुला बादलो को मेने
तेरे अँगन में खूब वर्षाया
जो टाहेनिया मेरी सूख गई, टूट गई
सर्दियों में खुदको जलाकर
तेरा बदन तपाया
जब-जब मैं फला-फुला
तूने मेरा ही फल खाया
बन औषधियाँ मेने ही
तेरा जीवन बचाया
मेरी ही वायु साँस बनकर
दमका रही है तेरी काया
मिटगाया श्रष्टी से मैं तो
ये बादल कैसे कड़केगा
बिन पानी ये झरना कैसे ढारकेगा
ऐ मनुष्य बता नहीं होगी वायु
तो तेरा दिल फिर कैसे तेरी
प्रियसी के लिए धड्केगा
निस्वार्थ खड़ा मैं एक वृक्ष हूँ
तेरा जीवन हो सार्थक
इसलिए तेरे समक्ष हूँ....!

देवेन्द्र "सागर"
१३-०६-२०१४




Thursday, June 12, 2014

~~मेरे सबाल आप से~~


~~मेरे सबाल आप से~~

कब तक में अजन्मी रहूगी
कब तक कोख में दमन होता रहेगा..?

ख़त्म हो जाएगा अस्तित्व मेरा
कब तक भारत सोता रहेगा..?

कब तक में अनपढ़ रहूगी
कब तक बेटा-बेटी भेद होता रहेगा..?

कब तक ऐ मनुष्य पाप के बीज बोता रहेगा
कब तक बाल विवाह के नाम पर मेरा
शोषण होता रहेगा.....?

मैं दुल्हन तेरी कब तक पराई बनाता रहेगा
कब तक दहेज़ की चिता में जलाता रहेगा..?

कब तक अस्मिता मेरी लुटती रहेगी
कब तक माँ का दूध शर्मसार होता रहेगा..?

कब तक बासना की होली खिलती रहेगी
कब तक दामन दागदार होता रहेगा....?

नजर आते है चीर खीचते अनेको दुशासन
हाँ बहेन सुरक्षित हैं तू मेरी क्ष्त्रछाया में..!

दाग लगा ना पएगा कोई रहते मेरे तेरी काया में
हाँ बहेन हैं तू मेरी तेरा भाया में..!

कोन भाई क्रष्ण बन कर ये कहेगा...?
कोन शिव बन कर साथ मेरे रहेगा...?

देवेन्द्र "सागर"
१२-०६-२०१४


Wednesday, June 11, 2014

~~स्कूल चले हम~~



~~स्कूल चले हम~~

आओ शिक्षा की लौ जलाए
अज्ञानता के अंधकार को भगाए

गांव गांव बस्ती बस्ती जाए
घर - घर शिक्षा पहुचाए

जहाँ नहीं है पाठशाला
बन शिक्षादूत हम उन्हें पढाए

जीवन का सबसे बड़ा
पुण्यकार्य कर धन्य हो जाऐ

एक निर्धन बच्चे को शिक्षित
करने का व्रत उठाए

बात कहे हम सच्ची
बच्चा अज्ञान रहे ना बच्ची

राष्ट्र भक्त बनेगा सच्चा
गर पढालिखा होगा हर बच्चा

मानवता का पाठ पढाए
स्कूल चले हम अभियान चलाए

देवेन्द्र "सागर"
११-०६-२०१४