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Friday, June 13, 2014

~~वृक्ष~~


~~वृक्ष~~

ना काटो मुझे भी दर्द होता है
जीवन मुझसे ही है
जीवन मुझ में भी है
दिल मेरा भी रोता है
रक्त मेरा भी बहता है
रक्त्वाह्नियों से
क्यूँ जुदा करते हो मुझे
मेरी ही टहनियों से
मेने बचपन देखा है
तेरे दादा का
वो अल्हड़पन, लड़कपन
तेरे पापा का
डालकर मुझ पर झुला
तुझ को खूब झुलाया
जब खेल-खेल कर थका तू
तब देकर सीतल समीर मेने
तुझ को ख़ूब सुलाया
सूरज ने मोसम को तपिस से अपनी
जब-जब गरमाया
तब-तब बुला बादलो को मेने
तेरे अँगन में खूब वर्षाया
जो टाहेनिया मेरी सूख गई, टूट गई
सर्दियों में खुदको जलाकर
तेरा बदन तपाया
जब-जब मैं फला-फुला
तूने मेरा ही फल खाया
बन औषधियाँ मेने ही
तेरा जीवन बचाया
मेरी ही वायु साँस बनकर
दमका रही है तेरी काया
मिटगाया श्रष्टी से मैं तो
ये बादल कैसे कड़केगा
बिन पानी ये झरना कैसे ढारकेगा
ऐ मनुष्य बता नहीं होगी वायु
तो तेरा दिल फिर कैसे तेरी
प्रियसी के लिए धड्केगा
निस्वार्थ खड़ा मैं एक वृक्ष हूँ
तेरा जीवन हो सार्थक
इसलिए तेरे समक्ष हूँ....!

देवेन्द्र "सागर"
१३-०६-२०१४




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