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Sunday, December 14, 2014

""गरीबी""



खुशबू तो आती है रहीशो के वस्त्रो से
गरीवो में तो अक्सर महनत की वू होती है

महकता है आशियाना रहीसो के भोजन से
गरीवो के हाथो में तो बस भूक होती है

तुम तो रहते हो आशियाने में चैन से
गरीबो के सर रात ठण्ड दिन धूप होती है

उन्ही ने खड़ी की दीवारे उन्ही ने दी छत तुम्हे
उन्ही की चौखट पर गरीवी रोती है

क्यों इतराते हो बड़ी-बड़ी इमारतो पर
नीव में लगी ईट उन्ही के हाथो की होती है

देवेन्द्र "सागर"
12/12/2014

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