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Monday, July 26, 2021

चिट्ठियां

अब बन्द हो गया बो चिट्ठियों का आना
डाकिया काका का  कुंडी खटखटाना
पाकर चिट्ठी को खुशियों से झूम जाना
शब्दो को मोतियों सा पिरोह कर सजना
और लिखते - लिखते, मंद - मंद मुस्काना
भेज देते, भरकर संवेदनाओं का खजाना
बन्द हुआ अब डाकिया काका का आना
वक्त की भूलभुलाइयों में खो गाया कही
बो सुहाना चिट्ठियों बाला हमारा जमाना

देवेन्द्र सगर "सागर "
१०/०७/२०२१

मेघा तेरी बूंद

बाल  भीगे 
पलके भीगे
चहरे से ढरकती 
 मेघा तेरी बूंद,,,,

तन  भीगा
बदन  भीगा
वस्त्रों से सरकती
मेघा तेरी बूंद,,,,

अक्स  भीगे
अश्क  भीगे
अधरो पे लरज़ती
मेघा तेरी बूंद,,,,

बिजली चमकी
बदल गरजे
पक्षी भीगे
पत्ते भीगे
छम छम बरसती
मेघा तेरी बूंद,,,,

खूब उमड़ी 
काली बदरी
मन ने लगाई
तन्हाई की छतरी
मन को ना भिगोपाती
मेघा तेरी बूंद,,,

देवेन्द्र सगर "सागर"
२६/०७/२०२१

Monday, July 12, 2021

झूठे रिश्ते

जिन रिश्तों में,
बोझ ढोना पड़े..
झूठी हंसी ऊपर से,
अंदर से रोना पड़े..
मन में नही जो,
उसका होना पड़े..
ऐसे रिश्ते को,
तोड़ क्यों नहीं देते,,,???

मन की जिससे,
ना कभी बात हो..
दिखावे के लिए,
इक दूजे का साथ हो..
ह्रदय में चुभे शूल सा,
पर हाथो में हाथ हो...
सपनो में लगे ना अच्छा,
जीवन की अंधेरी हर रात हो...
ना मन की हो जीत,
ख्वाइसों की मात हो..
ऐसे साथी को ,
छोड़ क्यों नही देते,,,,???

झूठे बंधनों को
तोड़ क्यों नही देते,,,???

लगने लगा जो खारा पानी
"सागर" से मुख मोड़ क्यों नही लेते,,,???
देवेन्द्र सगर "सागर "

Saturday, March 13, 2021

"सागर"

हम और तुम है इस दुनियां के खेल खिलोने...
सुबह जन्म लेते है बस शाम में विलीन होने...!! 
देवेन्द्र सगर 
13/03/2021

Monday, February 8, 2021

मैं आदिवासी हूँ

हाँ! मैं आदिकाल से यहाँ रहने बाला, आदिवासी हूँ...

अनाधुन्द जंगल काटे किसी ने  ना दुख बांटे
पर किसी के भय से छोड़े नही जंगल,
हाँ मैं यहाँ का ही रहवासी, गिरीवासी,वनवासी हूँ
हाँ! मैं आदिकाल से यहाँ रहने बाला ,आदिवासी हूँ

जंगल , नदी, झरने, पहाड़, ये सब मेरा घरद्वार,
हाथी, घोड़े, ऊंट, शेर, सियार आदि पशु मेरे यार
प्रकृति मेरी सम्पदा, पर दिल से सन्यासी हूँ
हाँ! मैं आदिकाल से यहाँ रहने बाला आदिवासी हूँ
देवेन्द्र सगर "सागर"
दिनांक ०९/ ०८/२०२०

बेटियां

बेटियों को सीखा दो हड्डियां तोड़ना
रोटियां तो बो फिर भी बना लेंगी,,,।
दे दो उन्हें दरिन्दों को जलाने का हुनर
चूल्हा तो बो फिर भी सुलगा लेंगी
सिखादो पागल जनबरो में नकेल डालना
घर तो बो फिर भी सजा लेंगी
भरदो बेटियों में बेटो सा साहस
सीखा बचाना खुदको, तो फिर मुस्कुरा लेंगी,,,।
देवेन्द्र सगर "सागर"
06/10/2020