अब बन्द हो गया बो चिट्ठियों का आना
डाकिया काका का कुंडी खटखटाना
पाकर चिट्ठी को खुशियों से झूम जाना
शब्दो को मोतियों सा पिरोह कर सजना
और लिखते - लिखते, मंद - मंद मुस्काना
भेज देते, भरकर संवेदनाओं का खजाना
बन्द हुआ अब डाकिया काका का आना
वक्त की भूलभुलाइयों में खो गाया कही
बो सुहाना चिट्ठियों बाला हमारा जमाना
देवेन्द्र सगर "सागर "
१०/०७/२०२१