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Monday, July 26, 2021

चिट्ठियां

अब बन्द हो गया बो चिट्ठियों का आना
डाकिया काका का  कुंडी खटखटाना
पाकर चिट्ठी को खुशियों से झूम जाना
शब्दो को मोतियों सा पिरोह कर सजना
और लिखते - लिखते, मंद - मंद मुस्काना
भेज देते, भरकर संवेदनाओं का खजाना
बन्द हुआ अब डाकिया काका का आना
वक्त की भूलभुलाइयों में खो गाया कही
बो सुहाना चिट्ठियों बाला हमारा जमाना

देवेन्द्र सगर "सागर "
१०/०७/२०२१

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