जिन रिश्तों में,
बोझ ढोना पड़े..
झूठी हंसी ऊपर से,
अंदर से रोना पड़े..
मन में नही जो,
उसका होना पड़े..
ऐसे रिश्ते को,
तोड़ क्यों नहीं देते,,,???
मन की जिससे,
ना कभी बात हो..
दिखावे के लिए,
इक दूजे का साथ हो..
ह्रदय में चुभे शूल सा,
पर हाथो में हाथ हो...
सपनो में लगे ना अच्छा,
जीवन की अंधेरी हर रात हो...
ना मन की हो जीत,
ख्वाइसों की मात हो..
ऐसे साथी को ,
छोड़ क्यों नही देते,,,,???
झूठे बंधनों को
तोड़ क्यों नही देते,,,???
लगने लगा जो खारा पानी
"सागर" से मुख मोड़ क्यों नही लेते,,,???
देवेन्द्र सगर "सागर "
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