Followers

Tuesday, September 9, 2014

तुम तुम्ही हो या और कोई

जिन को देखा करते थे ख्बाबो में
मालूम नहीं तुम बो ही ही या और कोई

जो अप्सरा सोते से जगाती थी स्वप्न में
मालूम नहीं तुम बो ही हो या और कोई

कल्पनाओ के ताने-बाने बुना करते थे मन में
मालूम नहीं तुम बोही हो या और कोई

जिन के लिए हर पल बेचेन रहा करते थे
मालूम नहीं तुम बो ही हो या और कोई

दिल चाहता है तुम्हे देखते रहे हर दम
कोई भी हो बड़ी कमसिन हो तुम

देख कर आँखों पर यकीन ना रहा
मालूम नहीं तुम तुम्ही हो या और कोई...

देवेंन्द्र "सागर"
06/10/1995

2 comments: