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Friday, October 24, 2014

गोबर्धन



कहे ब्रज की प्रजा सारी
रूठे इंद्र गुस्सा बहुत भारी
बादल गरजे विजली चमके
मची ब्रज में खूब आहकरी

फटे बादल वर्षे पानी
देख क्रोध देव इन्द्र का
ब्रज प्रजा है थर्रानी
घबराई प्रजा चिल्लानी

बड़ा वाल कृष्ण खड़ा आगे
मैं हूँ डरो नहीं नाही कोई भागे
उठाया ऊँगली पर्वत गोवर्धन
बुलाये नीचे ब्रजवासी सारे

बाल ना बाँका हुआ किसीका
देव इंद्र खूब रहे पश्च्ताये
तोड़ घमण्ड देव इन्द्र का
मुस्काये और गोबर्धन पूजबाये...

देवेन्द्र सगर "सागर"
24/10/2014

Tuesday, October 14, 2014

साईकिल



रही बचपन से साथ तेरे में
घुमती रही फिरती रही
धुप में छाँव में
तुम को समेट कर अपनी बाँहों में.....

तेरे हाथो में अपने हाथो को थमा कर
अपने पाँव पर तेरे पाँव जमकर
चलती रही निरंतर तेरे साथ में....

गिरते साथ में उठते साथ में
और फिर सम्हाल कर
हो जाते थे तैयार चलने के लिए
पकड़कर एक दूजे को
धूमिल हाथ में........

आज मुझसे ज्यादा
चमकती-दमकती तुझे कोई
नई मिल गई जीवन के पथ पर
तेरे साथ दौड़ने को......

तो तुम भूल गए मुझ को
और छोड़ गए बेकार समझ कर
अपने तहखाने में
आहिस्ता-आहिस्ता मरने को.....

आज जरुरत है मेरे
अस्तित्व को बचने की
मैं सहायक हूँ श्रष्टि को
बचाकर तेरा साथ निभाने की....

समझो तो मैं तुम्हारे लिए दिल हूँ
मैं बोही बचपन बाली तुम्हारी
प्यारी साईकिल हूँ...साईकिल हूँ...

देवेन्द सगर "सागर"
१३/१०/२०१४

"आदमी"


गलतियों का पुतला है आदमी
आदमी आदमी ही क्यूँ रहता
आदमी फिर खुदा ना होता.....
फितरत है भूलने की आदमी को
समझता सब आदमी तो
आदमी आदमी से जुदा न होता.....

देवेन्द्र "सागर"
13/10/2014

Sunday, October 12, 2014

सरहद पर पीया मेरे


चाँद भी निहारता है मेरे पिया को
देता है दुआए धडकते जिया को
बो खड़ा आज भी बना सरहद पहरी
जब पूज रही तुम सब अपने पिया को

देवेन्द्र "सागर"
12/10/2014