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Tuesday, October 14, 2014

साईकिल



रही बचपन से साथ तेरे में
घुमती रही फिरती रही
धुप में छाँव में
तुम को समेट कर अपनी बाँहों में.....

तेरे हाथो में अपने हाथो को थमा कर
अपने पाँव पर तेरे पाँव जमकर
चलती रही निरंतर तेरे साथ में....

गिरते साथ में उठते साथ में
और फिर सम्हाल कर
हो जाते थे तैयार चलने के लिए
पकड़कर एक दूजे को
धूमिल हाथ में........

आज मुझसे ज्यादा
चमकती-दमकती तुझे कोई
नई मिल गई जीवन के पथ पर
तेरे साथ दौड़ने को......

तो तुम भूल गए मुझ को
और छोड़ गए बेकार समझ कर
अपने तहखाने में
आहिस्ता-आहिस्ता मरने को.....

आज जरुरत है मेरे
अस्तित्व को बचने की
मैं सहायक हूँ श्रष्टि को
बचाकर तेरा साथ निभाने की....

समझो तो मैं तुम्हारे लिए दिल हूँ
मैं बोही बचपन बाली तुम्हारी
प्यारी साईकिल हूँ...साईकिल हूँ...

देवेन्द सगर "सागर"
१३/१०/२०१४

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