कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
चाहते है हम भी सुन्दर बन कर रहना
पर इच्छाओ को कर के दमन
उन से लड़ना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
ढोकर कचरा पैसे लाते
बापू उन्हें सराब में उड़ाते
ढोने कचरा जिस दिन नहीं जाते
मार उनकी खूब सहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
माँ मेरे बापू से खूब पिटती है
जवानी में ही बुढ़ीसी लगती है
बो भी घर-घर वर्तन धोती है
दिनभर करती कम रातभर रोती है
फिर भी साथ बापू के रहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
लाती माँ दो पैसे भूख मिटाने को
उस से भी चूल्हा जलता नहीं
तब इच्छाओ की आहूति देकर
जिस्म जलाना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पढता है
कोई आता नहीं मेरे बापू को समझाने
कोपी किताब और बस्ता मुझे दिलाने
समझता नहीं कोई मेरी बाल इच्छाओ को
मैं भी जीना चाहती हूँ तुम्हारी तराह कहना पढता है
कचरा ढोना काम नहीं गबारा मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
गरीबो के यहाँ तो मैं पैदा हो भी जाती हूँ
अमीरों के यहाँ तो कोख में ही मरना पड़ता है
जिन्दगी यूँ ही निकलती समझोतो में
बेटी हूँ इस लिऐ मुझे सब सहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पढता है......
देवेन्द्र "सागर"
३१-०५-२०१४

Sundar vichar
ReplyDeleteबाल मजदूरी सघन अपराध है
ReplyDeleteमार्मिक रचना
ReplyDeleteसमाज की नंगी सच्चाई