वेबसी,बेहयाई के घुंगरू
पिरोह कर
पहना दिया गहना पैरो का.......
भरोषे का सिला नबाजा
तुमने
बनाकर खिलौना महफ़िल
में गिरो का....
हँसती रही हँसाती रही
नाचती रही गाती रही
खुद का दिल रुलाकर
बहलाया मेने ओरो का......
पछता रही हूँ अपनी
महोब्बत पर
क्यूँ देखा था खुआब
शहरो का.....
गम गुसारी मिलता
नहीं कोई
ए तो शहर है गुंगो-
बहरो का........
किस हुजूम में खो गयी
मुज्तरिब है दिल
"सागर" अब ना भरोसा करना
अपना समझकर गिरो का......
वरना बेच देगा तुझे भी कोई
फिर खाता रहना थपेड़ा
पश्चाताप की लहरों का......
देवेन्द्र "सागर"
२०-०८-२०१४

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