इस बेरहम दुनिया मे ढूढ़ते है
आशियाना कोई......
खाने को दो वक़्त का भोजन
रहने को ठिकाना कोई.....
ठण्ड से हे जकड़े ,
तन पर नहींकोई कपड़े ....
उनसे माँगने को उतरन
सोचते है बहाना कोई......
ना देखते ख्बाब अमीरी के
ना चाहत है पैसो की.....
बस लुटा दे हमपर बेसुमार
प्यार का खजाना कोई.....
देवेन्द्र "सागर"
२४-०८-२०१४

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