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Thursday, July 31, 2014

क्यों की मैं अछूत हूँ



भविष्य नहीं मैं भूत हूँ
क्यों की मैं अछूत हूँ
चाहे जितना हो हुनर मुझ में
फिर भी करतूत हूँ
क्योकि मैं अछूत हूँ
एकलव्य हूँ मैं
छल का सबूत हूँ
क्योकि मैं अछूत हूँ
कहे जग दानवीर कर्ण मुझे
ममता भी अपना ना
पाई मुझे कुन्ती का
बड़ा पूत हूँ
क्योकि मैं अछूत हूँ
बन रानी लक्ष्मी लड़ी खूब
समर में अंग्रेजो से
मैं झलकारी हूँ
वीरता की मूर्त हूँ
इतिहास के पन्नो में दबी पड़ी हूँ
क्यों की में अछूत हूँ
आकर एक है
रक्त एक है
कहने को तो
भारत माँ का सपूत हूँ
फिर भी सबसे अलग हूँ
अस्पर्स हूँ
क्यों की में अछूत हूँ

देवेन्द्र " सागर "
३१-०७-२०१४


Saturday, July 26, 2014

जिन्दगी


गैरो से लड़ना होता तो दमभर लड़ता
खुद से लड़ रहा हूँ ,जंग है जिन्दगी
तू नहीं तो कैसी बेरंग है  जिन्दगी
मयकदा सूना है सूनी है जिन्दगी....

तुझ में ही जी रहा था तुझमे ही जी रहा हूँ
लेके तेरा नाम जाम पर जाम पी रहा हूँ
कटघरे में खड़ा हूँ अदालत लगी मौत की
दोषी  हूँ  मैं  या  खुनी  है  जिन्दगी....

कभी मुझमे हुआ करती थी जिन्दगी
आज मुझ से झिझक रही है जिन्दगी
देखो किस तरह सिसक रही है जिन्दगी
धीरे-धीरे मुझसे खिसक रही है जिन्दगी..

देवेन्द्र "सागर"
२६-०७-२०१४

Friday, July 25, 2014

एकलव्य


         "एकलव्य"

वनों का था वनबासी
जो सभ्यता में था सभ्य,,,
था वीर धनुर्धर बो एकलव्य,,,

क्या वनबासी होना
था उसका अपराध,,,,
क्या इसी लिऐ नहीं था
बो गुरुशिक्षा का हकदार,,,,

छला द्रोण ने
फिर भी पंहुचा अपने
गंतव्य,,,,
खीच बाण उंगलियों से
धर्मयुद्ध में बना 
श्रेष्ट धनुर्धर एकलव्य,,,

माँगा जो द्रोण ने
अंगूठा दांए हाथ का
दे दिया गुरु मान कर,,,,
चला सकुगा ना वाण कभी,
गुरु दक्षिणा दी ये जान कर,,,,

शिष्य परम्परा में अमर हुआ,
था द्रोण से जिसका
व्यक्तित्व भव्य,,,,
था बो वीर धनुर्धर 
एकलव्य,,,

देवेन्द्र "सागर"
२५-०७-२०१४


Wednesday, July 23, 2014

तुम्हारी ये आँखे


कितनी खूबसूरत है
तुम्हारी ये आँखे.....
मुझे दीवाना बना गई
तुम्हारी ये आँखे....
मेरी आँखों से नीद
चुरालेगइ
तुम्हारी ये आँखे....
दिल की बात इशारो
में समझा गई
तुम्हारी ये आँखे....
लोग जाते है मय पीने
मयखाने
नशा-ए-खुम करागई
तुम्हारी ये आँखे....
कैसे करू शुक्रिया इनका
मेरी दुनिया को जन्नत
बनागई
तुम्हारी ये आँखे....

देवेन्द्र "सागर"
01-04-2001



मेरा बचपन


♡♡ मेरा बचपन पुराना ♡♡


धुंदली सी यादें रहगई है अब नजरो में
जिसे देखे हुऐ बीत गया एक जमाना
आज शहर कि चार दीबारियो में
बो जाने कहाँ खोकर रह गया है
बचपन का मेरा अपना जमाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना ....

बो बचपन का रोना रोते-रोते सो जाना
गांव कि धूल में भागना ओरो को भगाना
पेड़ पर चढ़ना चढ़कर कूद जाना
पेड़ पर छुपना छुपकर चिल्लाना
बो पूँछाले बाली पतंगे उड़ाना बो पेच लड़ना
याद आता है मेरा बचपन पुराना

याद आता है गांव में वर्षात का आना
गड्डो के पानी को छप-छप करके उचकाना
पानी में भीगना और भाग-भाग कर नहाना
बो कागज कि नाव चलना डूबने पर रूठ जाना
बो गांव कि कीचड़, कीचड़ में कूद जाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ...

याद आती है बो चूल्हे कि रोटियां
बो अष्ट - चंगा कि गोटियां
बो पुराने गिल्ली - डंडा के खेल
बो माचिस कि डिब्बियों कि रेल
जहेन में आज भी है बो दादी के
किस्सो का खजाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ...

याद आता है दूर पहाड़ियों पर जंगल
बो मेलो में पहेलबानो का दंगल
बो मुर्गे -मुर्गियों का आपस लड़ना
बो बैलगाड़ियों का दौड़ में भगाना
बो बंदूको से गुब्बारों पर निसाना लगाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ....

याद आती है बो चिड़ियों कि चहक
खेतो में भीगी-भीगी मिट्टी की महक
बो लहराती फसलो कि हरियाली
बो भोर के सूरज कि लाली
बो बदलो कि घटा काली
बो स्कूल न जाने का झुटा सा बहाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ........

सिमट गयी बो यादें मेरे ही मन में
कही खोगया मेरा बचपन मेरे ही तन में
कहाँ गई बो छोटी-छोटी कतरो बाली चिड़िया
दिखती है तो बस ऊँची-ऊँची इमारते गगन में
क्या करे कैसे समझाए मन "सागर" दीवाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. .......

देवेन्द्र " सागर "
२५-०२-२०१४


Monday, July 21, 2014

प्रिय मानसून


तरस रहे थे नयन
तुम्हे देखने को
प्रिय "मानसून"
आकर मन को
स्नेह से भर दिया.....

बरसाया जो
प्रेम-सागर धरा पर
उढ़ा चुनर
हरियाली की
धरा को ममतत्व से
भर दिया.......

वीज हुए अंकुरित
कली बन फूल
महक उठे बागो में
सूखे, कटे वृछो में भी
'प्राण' फिर से धर दिया....

भर जल-अमृत से
सारे नदी सरोबर
प्राणी जीवन धन्य कर दिया.....

देवेन्द्र "सागर"
२१-०७-२०१४



Sunday, July 20, 2014

नगरबधू

ज्यो - ज्यो रात होती है
जुल्मो की बरसात होती है

बेच दिया सौहर ने मुझको
कहाँ अब उस से बात होती है

अब हर रात बनती दुल्हन में
माँग मेरी हर रात उजड़ती है

अब मिलते है सब सौहार बनकर
जिस जिस से मुलाकात होती है

मैं जीते-जी मरती हूँ हर रोज
जब जिस्म लूटने की शुरुआत होती है

मैं सहती जिल्लत भूख मिटाने को
उनकी भूक मुझसे मिटती है

बो तृप्त होके चले जाते है
आत्मा मेरी हर रात रोती है

कहते है समाज की गंदगी हूँ मैं
हर रात क्यूँ न्यौछावर समाज होती है

गर सरीफो का शहर है ये तो
जिस्मफरोशी की क्यूँ बात होती है

देवेन्द्र "सागर"
१९-०७-२०१४





बरसात


   जब जब बरसात का महीना आता है
   जाने क्यूँ दिल बेकाबू हो जाता है

   बरसे मेह जब तड़-तड़ गरजे बदल
   जाने क्यूँ मेरा दिल घबराता है

   ज्यूँ - ज्यूँ बुँदे गिरे बदन पर
   कर तन ठण्डा मन में अग्न लगता है

   ले बहो में प्रयसी तू भी वर्षा प्यार जरासा
   मन की अग्न बुझाले कह कह उकसाता हैं

   कप कपाता बदन करलेती जब आलिंगन
   गेशुओ से झरता पानी होटों का कम्पन भाता है

   मिलते दो दिलो को और करीब लाता है
   जब-जब बरसात का महिना आता है

    देवेन्द्र "सागर"
    १९-०७-२०१४



Friday, July 18, 2014

हायकू प्यार तू


 मेरा प्यार तू
प्रेम का संसार तू
 है आधार तू

 तुझसे ही है
दिल का धड़कना
 धड़कन तू

 पलके खोलू
तो नजर आए तू
 आँखों में है तू

 पलके बंद
सपनो में आए तू
 सरमाए तू

 देखू आयना
दिखे सिर्फ-सिर्फ तू
 मेरी शक्ल तू

 लू जब सांसे
मन महकाए तू
 यूँ समाए तू

 तुझ में हूँ मैं
एक है तू-मैं, मैं-तू
 मुझ से है तू

 मेरे लिए है
एक रहनुमा तू
 एक खुदा तू

देवेन्द्र "सागर"
१८-०७-२०१४




Thursday, July 17, 2014

सपूत "आजाद"




जन्मा जो भारत माँ का मान बढाने
बो भारत माँ का सपूत "आजाद"था

कैसे रहता बंधन में पंक्षी स्वतंत्र गगन का
चिड़िया नहीं, चील नहीं, बो  तो वाज था

स्वतंत्र परिन्दे जैसा जिया जीवन जिसने
बो भारत माँ का सपूत  "आजाद" था

लड़के लेगे आजादी किया जिसने शंखनाद था
बो भारत माँ का सपूत  "आजाद"  था

अंग्रेजो का जो लूटा बड़ा खजाना
थर्राए फिरंगी किया वीरता का काज था

भारत के कण-कण को भी जिसपर नाज था
बो भारत माँ का सपूत  "आजाद"  था

नापाक हाथ कोई छूए शरीर को
कहाँ ऐ उस वीर को बर्दास्त था

मारे मुझे कोई औकात भला क्या उसकी
बो माँ का शेर भरे वीरो सा सहास था

लड़ते-लड़ते चुनी खुद ही मौत
बो कहाँ यमराज का मोहताज था

लिख गया इतिहास आजादी का 'लहू' से
बो भारत माँ का सपूत "आजाद" था

देवेन्द्र "सागर"
१७-०७-२०१४


Wednesday, July 16, 2014

जिन्दगी क्या है


जिन्दगी क्या
जीवन के रंगमंच पर
कठपुतलियो का नृत है
डोर है कोई और खिचता
दीखता सिर्फ हमारा कृत है
मनुष्य यूँ ही करता गर्भ शरीर पर
शरीर मात्र उसका भ्रत है
फेला भ्रम सर्वत्र यहाँ
कुछ है तो बस मृत्यू ही सत्य है

देवेन्द्र "सागर"
१४/०७/२०१४


Thursday, July 10, 2014

ना आओ मेरे शहर



ना आओ मेरे शहर तो अच्छा ही है
मेरे शहर के हालत बदल गए.....

टूट पड़ते है औरतो पर चील-कौओ की तरह...
इंसानियत बाले लोगो के ख्यालात बदल गए....

मानभंग कर निर्वस्त्र लटका देते है पेड़ो पर लाशे
संवेदनाए ख़त्म हुई लोगो के जज्बात बदल गए...

खो गए रिश्ते-नाते चकाचौध की भीड़ में
कर खून विश्वास का वो हर बार बदल गए....

बो दिल बदल गए बो लोग बदल गए
ना आओ मेरे शहर के हालात बदल गए....

देवेन्द्र "सागर"
०९/०७/२०१४


Friday, July 4, 2014

दर्दे दिल



बने थे जो हमारे लिए महोब्बत-ऐ-गुलिस्ता
आज बो वीरान-ऐ-दश्त हो गए....

मिलते थे जो हमसे होकर गाफित हर वक़्त
बो हमारे लिए अब वेवक़्त हो गए....

संजोये थे महोब्बत में सपनो के ताने-वाने
बो बेगाने सपने पुराने लख्त-लख्त हो गए..

देवेन्द्र "सागर"
04/07/2014

वीरान-ऐ-दस्त= उजड़े जंगल
गाफित = बेखबर
लख्त-लख्त = टुकड़े-टुकड़े