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Wednesday, July 16, 2014

जिन्दगी क्या है


जिन्दगी क्या
जीवन के रंगमंच पर
कठपुतलियो का नृत है
डोर है कोई और खिचता
दीखता सिर्फ हमारा कृत है
मनुष्य यूँ ही करता गर्भ शरीर पर
शरीर मात्र उसका भ्रत है
फेला भ्रम सर्वत्र यहाँ
कुछ है तो बस मृत्यू ही सत्य है

देवेन्द्र "सागर"
१४/०७/२०१४


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