तरस रहे थे नयन
तुम्हे देखने को
प्रिय "मानसून"
आकर मन को
स्नेह से भर दिया.....
बरसाया जो
प्रेम-सागर धरा पर
उढ़ा चुनर
हरियाली की
धरा को ममतत्व से
भर दिया.......
वीज हुए अंकुरित
कली बन फूल
महक उठे बागो में
सूखे, कटे वृछो में भी
'प्राण' फिर से धर दिया....
भर जल-अमृत से
सारे नदी सरोबर
प्राणी जीवन धन्य कर दिया.....
देवेन्द्र "सागर"
२१-०७-२०१४

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