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Saturday, July 26, 2014

जिन्दगी


गैरो से लड़ना होता तो दमभर लड़ता
खुद से लड़ रहा हूँ ,जंग है जिन्दगी
तू नहीं तो कैसी बेरंग है  जिन्दगी
मयकदा सूना है सूनी है जिन्दगी....

तुझ में ही जी रहा था तुझमे ही जी रहा हूँ
लेके तेरा नाम जाम पर जाम पी रहा हूँ
कटघरे में खड़ा हूँ अदालत लगी मौत की
दोषी  हूँ  मैं  या  खुनी  है  जिन्दगी....

कभी मुझमे हुआ करती थी जिन्दगी
आज मुझ से झिझक रही है जिन्दगी
देखो किस तरह सिसक रही है जिन्दगी
धीरे-धीरे मुझसे खिसक रही है जिन्दगी..

देवेन्द्र "सागर"
२६-०७-२०१४

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