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Sunday, July 20, 2014

नगरबधू

ज्यो - ज्यो रात होती है
जुल्मो की बरसात होती है

बेच दिया सौहर ने मुझको
कहाँ अब उस से बात होती है

अब हर रात बनती दुल्हन में
माँग मेरी हर रात उजड़ती है

अब मिलते है सब सौहार बनकर
जिस जिस से मुलाकात होती है

मैं जीते-जी मरती हूँ हर रोज
जब जिस्म लूटने की शुरुआत होती है

मैं सहती जिल्लत भूख मिटाने को
उनकी भूक मुझसे मिटती है

बो तृप्त होके चले जाते है
आत्मा मेरी हर रात रोती है

कहते है समाज की गंदगी हूँ मैं
हर रात क्यूँ न्यौछावर समाज होती है

गर सरीफो का शहर है ये तो
जिस्मफरोशी की क्यूँ बात होती है

देवेन्द्र "सागर"
१९-०७-२०१४





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