Followers

Friday, July 4, 2014

दर्दे दिल



बने थे जो हमारे लिए महोब्बत-ऐ-गुलिस्ता
आज बो वीरान-ऐ-दश्त हो गए....

मिलते थे जो हमसे होकर गाफित हर वक़्त
बो हमारे लिए अब वेवक़्त हो गए....

संजोये थे महोब्बत में सपनो के ताने-वाने
बो बेगाने सपने पुराने लख्त-लख्त हो गए..

देवेन्द्र "सागर"
04/07/2014

वीरान-ऐ-दस्त= उजड़े जंगल
गाफित = बेखबर
लख्त-लख्त = टुकड़े-टुकड़े


1 comment: