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Sunday, July 20, 2014

बरसात


   जब जब बरसात का महीना आता है
   जाने क्यूँ दिल बेकाबू हो जाता है

   बरसे मेह जब तड़-तड़ गरजे बदल
   जाने क्यूँ मेरा दिल घबराता है

   ज्यूँ - ज्यूँ बुँदे गिरे बदन पर
   कर तन ठण्डा मन में अग्न लगता है

   ले बहो में प्रयसी तू भी वर्षा प्यार जरासा
   मन की अग्न बुझाले कह कह उकसाता हैं

   कप कपाता बदन करलेती जब आलिंगन
   गेशुओ से झरता पानी होटों का कम्पन भाता है

   मिलते दो दिलो को और करीब लाता है
   जब-जब बरसात का महिना आता है

    देवेन्द्र "सागर"
    १९-०७-२०१४



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