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Saturday, April 26, 2014

सितमगर



      वो सितमगर सितम करता गया, करता गया
      मैं महोबत में सहती गई, सहती गई .......

      बो मुझसे बदुआ कहता गया, कहता गया
      मैं उसके लिए दुआ करती गई, करती गई ....

      बो अपने जुल्मो से मुझे डराता गया, डराता गया
      महोबत रुसबा ना हो मेरी इसलिए मैं डरती गई,
      डरती गई ......

      क्या करती बड़ी सिद्दत से चाहती थी उसको
      बो पल-पल मारता गया मैं मरती गई, मरती गई .....

      देवेन्द्र "सागर"
      २३-०२-२०१४ 

"माँ"

   


     अपने रक्त से सीच कर
     प्राणदान देती माँ
     खुद सारे कष्ट सहती माँ
     कष्टों में हँसते हँसते रहती माँ
     मुख से कुछ न कहती माँ
     समझ ना आये बो जज्बात है माँ
     कही-अनकही बात है माँ
     मुसीबतों में साथ है माँ
     खुशियों की वर्षात है माँ
     प्यार-दुलार की सोगात है माँ
     जीवन के अंधियारे में
     पूर्णिमा की रात है माँ

     देवेन्द्र "सागर"
     २६-०४-२०१४


भारत का बलवीर

 
 

     मेरी शमसीर बहुत पुरानी है
     ये जंग की दीवानी है
     इसके विजय के बहुतेरे किस्से है
     इन किस्सो का हिस्सा मैं बन जाउगा
     मैं भारत का बालवीर हूँ
     भारत माँ का मान बढाँउगा .....

     नहीं ये किसी कि दासी है
     शिवाजी और वीर प्रताप के
     हाथो कि ये आदी है
     दुश्मनो का रक्त चढ़ाकर
     इसकी प्यास बुझाऊगा
     मैं भारत का बालवीर हूँ
     भारत माँ का मान बढाँउगा ......

     जो धरे नापाक कदम
     मेरी पुण्य बसुन्धरा पर
     ले शमसीर हाथो में
     सामने अड़ जाउगा
     खीच म्यान से शमसीर दुधारी
     दुश्मनो के शीश धड़ से
     अलग गिराऊगा
     मैं भारत का बालवीर हूँ
     भारत माँ का मान बढाँउगा .......

     रन-भूमी के वीर समर का
     इतिहास नहीं अभी पुराना है
     राष्ट्र की खातिर लड़ी समर मै
     उन देवीयों को भुला नहीं जमाना है ......

     देख सहास दुर्गावती का
     अकबर भी थर्राया था
     रानी अवंती बाई जब उतरी रन में
     कैप्टन वेडिंगटन चकराया था
     घोड़ो कि टापो से उसे
     खूंद-खूंद भगाया था
     लक्ष्मी  बाई जब लड़ी समर में
     दिखा कला शमसीर की
     अंग्रेजो का होस उड़ाया था .....

     जीते जी नहीं दिया राज्य अपना
     बलदानी परम्परा को निभाया था
     त्याग प्राण खुद ही अपने
    भारत माँ का मान बढ़ाया था ....

     उन्ही माताओ का दूध रगो में
     खोल रहा है लहू बन कर
     उस दूध कि लाज निभाउगा
     मै भारत का बालवीर हूँ
    भारत माँ का मान बढाँउगा.....

    देवेन्द्र " सागर "

घोड़ी चढ़जा

     
     जीवन में एक बार ही मिलता मोका
     छक्के कि मत सोच मार चोका
     एक कदम बो चले दो कदम तू बड़जा
     करले शादी घोड़ी चड़जा ........

     शादी बो लड्डू खाये बो पछताए
     जो न खाये बो और भी पछताए
     तू भी इस का स्वाद चखजा
     करले शादी घोड़ी चड़जा .........

     प्रियशी के हाथ से खूब खाना मिठाई
     झिझक न नहीं गर साली करे खिचाई
     प्रियशी को देना बेसुमार प्यार भाई
     ले "सागर" सबका आशिर्बाद आगे बड़जा
     करले शादी करले घोड़ी चड़जा .....

      देवेन्द्र " सागर "

Friday, April 25, 2014

टूटा दिल


           


         इस तरह भेदा है उसने दिल को
         तीर-ऐ-बेबफाई से .......
         डरने लगा हूँ आज मैं महोब्बत से
         और  जुदाई  से.........

                              देवेन्द्र " सागर "

औरत


   




          "औरत"

      सुंदरता में बाला है औरत
      चित्रकार के लिए कला है औरत

      प्यार करे तो बफा है औरत
      मनचली हो तो जफ़ा है औरत

      महोबत में नासा है औरत
      बेबफाई में सजा है औरत

      ख़जालत है तो बदुआ है औरत
      ग़मगुसारी है तो दुआ है औरत .....
       
       """"""""

श्रष्टि का निर्माण है औरत
रामायण मै त्याग है औरत
महाभारत मै विध्यवंस है औरत.....

      """""""

माँ है तो दुलार है औरत
वहन है तो प्यार है औरत
पत्नी है तो जान है औरत
मेरे लिए महान है औरत.....

  "रिंकू सागर "

इसी लिऐ मैं मय खाने जाता हूँ...





          मैं जब भी मयखाने जाता हूँ 
          मैं मय से मे भूल जाता हूँ 

          कोई नहीं पराया सब अपने से लगते है 
         जब मैं मय में डूब जाता हूँ 

          इसलिए मैं मयखाने जाता हूँ ................

          मेरी यादों में आता नहीं कोई अब 
          उस कि जफ़ाओ से नाता नहीं कोई अब 

         मय से मैं उसको भूल जाता हूँ 
         इसलिए मैं मयखाने जाता हूँ ..................

         एक जाम और पियूँगा मैं उस के नाम का 
         जो साथी न बन सका मेरे मुकाम का 

         पी कर मैं मय को कुछ लम्हे जी जाता हूँ 
         इसलिए मैं मयखाने जाता हूँ ..................

                     "रिंकू सागर "

Thursday, April 24, 2014

सूल की सईया




           तू सूल की सईया बना मेरे लिए
           मैं अपने जिस्म को बिछोना बना लूगा
           ज़माने भर के गम दे तू मुझको
           इन सूलो मे भी मैं फूलो का ऐहसास करा दूगा

               देवेन्द्र "सागर"
               २४-०४-२०१४

Wednesday, April 23, 2014

माँ मुझे भी पाठशाला भिजबादो




माँ मेरा भी करता है मन पढने का
जीवन में कुछ करने का
शिक्षा के पथ पर आगे बढ़ना का
मेडम जी के रजिस्टर में
मेरा भी नाम लिखबा दो
माँ बापू से कहकर
मुझे भी पाठशाला भिजबा दो

मै भैया जैसे नहीं रोऊँगी
देर सुबह तक नहीं सोऊँगी
काम सारा तेरा कर जाऊँगी
तुझे जरासा भी ना सताऊँगी
बस थोड़ी सी सिपारिस
करबादो
माँ बापू से कहकर
मुझे भी पाठशाला भिजबादो...

में रोज स्कुल जाऊँगी
लंच में जो देगी सो लेजाऊँगी
पैसे भी नहीं माँगूगी
स्कुल से जल्दी नहीं भागूगी
माँ बस्ता न दिलबाना
बस उस में रखने बाली
किताब दिलबादो
माँ बापू से कहकर
मुझे भी पाठशाला भिजबादो....

माँ मुझे भी भैया जैसे पढना है
अज्ञानता से लड़ना है
माँ में टीचर बन जाऊँगी
चोपाल बाले नीम के नीचे
एक पाठशाला लगाउंगी
गाँव की सारी बालाओ  को पढ़ाऊँगी
माँ मेरा सपना साकार करबादो
माँ एक बार, बस एक बार
बापू से कहकर
मुझे भी पाठशाला भिजबादो....

देवेन्द्र "सागर"
२३-०४-२०१४

Tuesday, April 22, 2014

सर्द राते





               आज मेरे शहर डबरा में,,,,,,,,

               बरसात सुबह से रात बंद हुई
               पहले सर्द हवा फिर ठण्ड हुई ......

            ---------------$--------------

               ऐ मौसम तेरी क्या बेरुखी है हम से
             
               एक उनका साथ नहीं और करदी सर्द राते .... ?

                जैसे तैसे कट रही थी ये राते

               अब किस से कहे दिल कि बाते

               और भी बोझिल कर दी राते ...

                पलकों का झपकना दुस्बार हुआ

                 मिलती नहीं बो गर्म सांसे ....

                खो गई कही वो खुशबू उन के बदन कि

                और कही - अनकही बाते ......

                तड़फा रही है बो बोसा बाली सोगाते

                बड़ी वे -दर्द हो गई है ये तन्हां सर्द राते .....

                 देवेन्द्र "सागर "

दर्द दिल का किस से कहूँ.....







                           बिना उसके कैसे रहूँ .......
                           ऐ दर्दे - दिल किस से कहूँ

                           निकलता है वक्त अब उनकी यादों मै
                           ऐ यादों कि बाते किससे कहूँ

                          बो रहबर बन के आया जिन्दगी का
                          और तन्हा सफर में छोड़ गया

                          सफर बांकी है आभी जिंदगी का बहुत
                          इस अधूरे सफर की दस्ता किससे कहूँ

                             " सागर "

Sunday, April 20, 2014

मौत



जिन्दगी से रूबरू न हो पाया
मौत कहती है मेरे शहर में आशियाना बनाले

           ......

जब मौत की चाहत थी तो बो हम से खफा थी
आज जीने की आरजू है तो उसको महोब्बत होगई हमसे

         .........


बो कहती है चाहत है तुम से
मौत कहती है महोब्बत है तुम से
या रब किसे रुसबा करू
एक मेरे बस में है और एक के बस में मैं हूँ.....

             .....

मेरी मर्ग के बाद जनाजा निकले कू-ऐ-यार से
शायद उनसे दीदार-ऐ-मुलाकात हो जाए.....

देवेन्द्र "सागर"


दर्द की खलिश





                       तेरे दर्द कि खलिश ने ताउम्र
                       चैन से सोने न दिया ........
                       हम तो सिर्फ तेरे ही थे पर
                       तूने कभी अपना होने न दिया....

                       हम देते रहे तुम्हे महोब्बत सौगातो में
                       तिल - तिल मरते रहे फिरके में.....
                       मेरी चाहत कि सुंदरता को देख न सकी
                       तेरी नजरे लगी रही खुद के तराजे में....


                      (फिरके- व्योग कि पीड़ा )
                      ( तराजे- सृंगार )

                         देवेन्द्र " सागर "
                         २८-०३-२०१४ 

संवेदनहीन इन्सान




जिन्दगी हर पल,
हर क्षण है हादसा
इन्ही हादसों का शिकार
खून से लथ-पथ
सड़क पर पड़ा इन्सान
मासूम सा अचेतन सा
फिर ना खड़ा हो सका इन्सान
किसी का बेटा
किसी का भाई
कीसी का पति
दर्द से तड़पता इन्सान
खुली-खुली, बंद-बंद
झपकती पलके,
अपनों से मिलने की ताकता राह
मन में सँजोय अधूरे
सपनो को पूरा करने की चाह
छटपटाता  सा व्याकुल सा इन्सान
देखता उसे हुजूम लगाये खड़े
उत्सुक से इन्सान
कोई पास जाता नहीं
उसको हाथ लगता नहीं
उसको कोई उठाता नहीं
बस एकटक देखता इन्सान
ऐ क्या हो गया कैसे हो गया
पहले तो नहीं था
इतना निर्दयी,निष्ठुर,
भावना विहीन
संवेदना हीन इन्सान....

देवेन्द्र "सागर"
१९-०४-२०१४

Saturday, April 19, 2014

नशा


पीता था मैं , बादाख्वार न था 
तेरी नजरो का है कितना नशा 
ब -अंदाजा -ऐ खुमार न था ....

" सागर "



सबरना

           बड़ी देर कर दी तुम ने
           खुद को सवारने में 
           तुम्हारे लिए मुददतों से
           हर पल बिखर रहे थे हम....


              देवेन्द्र " सागर " 

Friday, April 18, 2014

बेटी




मेरी पहचान का प्रयत्न किया जाता है क्यूँ .... ???
मुझे मिटाने का यत्न किया जाता है क्यूँ ..... ???

गर आ भी जाती हूँ रसूकदारों कि दुनियां में
अनाथालय या कूड़ेदानों में फिकबाया जाता है क्यूँ . ??

मेरे पालन-पोषण में खेद होता है क्यूँ ..... ???
बेटे और बेटियो में भेद होता है क्यूँ ..... ????

बेटा मांगे तो न्योछाबर दौलत सरे जहाँ कि
बेटी मांगे तो जेब में छेद होता है क्यूँ .... ????

बेटा वंस चलाता है इसलिए बेटा आपना है
बेटी भी दो कुलो कि लाज निभाती फिर पराई क्यूँ ??


बेटा करे प्रेम-विवाह तो कोई बात नहीं
बेटी चुने जो अपना वर तो जग हंसाई क्यूँ ...????

सब के दुखो का मरहम बनती हूँ मैं
फिर मुझ को ही सताया जाता है क्यूँ ...?????

मैं नाचती ग्रहस्ती के आँगन में तेरे इशारो पर
फिर कोठो पर मुझे नचाया जाता है क्यूँ ....????

मारना ही हे तो मुझे विहा कर लाया जाता है क्यूँ ..??
चंद पैसो के लिए दहेज़ कि चिता में जलाया जाता है क्यूँ ....????????????.....?????

ऐसे ही कितने क्यूँ
 ...??.??.??
का जबाब खोजती हूँ ...!!!!!

बेटियो से सुसज्जित जहान
का खुआब सोचती हूँ ....!!!!!!!

क्या आप के पास है मेरे क्यूँ का जबाब ...??.???

देवेन्द्र "सागर"
२२ ०२ २०१४


खण्डहर

बो जो देख लेती चाहत की नजरो से
तो हमारा भी रूठने का बहाना न होता
बो ही बो होती जिन्दगी की बस्ती में
ऐ खंडहर जमाना ना होता.......


.

देवेन्द्र "सागर"
१८-०४-२०१४

सागर

"सागर"

जब सताती है तन्हाई
तो लिख लेते है कलाम
पढने से पहले
"सागर" का सलाम.....

अथाय है " सागर " विशाल है "सागर"
"सागर" में उछाल आता नहीं 
डूब जाऐ "सागर" के अंतर मन में 
फिर "सागर" से बहार जाता नहीं 

ले जाते है नीर बदल "सागर" से
जग जीवन करते खुशहाल
सब की ख़ुशी देख कर "सागर"
हो जाता है निहाल.......

देवेन्द्र "सागर"
२६-०२-२०१४


खाली बोतल

खाली बोतल

एक साम बो हुआ करती थी 
की उन के लवो तक 
हुआ करते थे हम 
आज हमारी  जिन्दगी 
उस खाली बोतल की तरह है 
जिसे लोग पी कर फेक देते है 

 देवेन्द्र "सागर"


होली





♥♥♥ग़मगीन होली ♥♥♥

मेरे यार कहते है लगबाओ होली का रंग
रोज पीतेहो शराब आओ आज पिलाये भंग
बो क्या समझे कितने लगे है मुझको रंग
शराब के सहारे लड़ रहा हूँ जिंदगी से जंग

अब मैं उन रंगो के बारे में बताना चाहुँगा
जो मेरे जीवन में परत दर परत चढ़े हुऐ है
 जरा ध्यान दीजियेगा .......

पहला रंग मुझ पर उस हरजाई का
दूजा रंग मुझ पर उसकी रुसबाई का
तीजा रंग मुझ पर उसकी जुदाई का
चौथा रंग मुझ पर उसकी बेबफाई का .....

दीखते नहीं ऐ रंग हुजूर मेरे चहरे पर
अबतो जान गए होगे मैं कितना रंगीन हूँ
पीता हूँ साकी शराब जो रोज तेरे मयकदे में
तो क्या हुआ मैं शराबी नहीं थोड़ासा ग़मगीन हूँ .....

इन रंगो पर कोन सा रंग चढ़ेगा अब होली का
ऐ साकी देखा था एक रंग उसकी डोली का
मांग में भर लिया बही रंग किसी और कि रोली का
बस अब एक ही रंग बचता है ऐ मौत तेरा
जो फीका करदे रंग सारा ,जीवन कि इस होली का..

 देवेन्द्र " सागर "
२५-०२-२०१४


       ♡♡♡कैसे खेलू होली ♡♡♡



      पिया नहीं संग कैसे खेलू होली
      लगता नहीं मन कैसे खेलू होली
      कररही हूँ महशुस उनकेबिन अकेली
      तू ही बता सखी कैसे खेलू होली...

      लग रहा है फीका हर रंग
      मन में यादो कि छिड़ी जंग
      करकस लगरही है हर बोली
      तू ही बता सखी कैसे खेलू होली .....

      सुलग रहा है तन विरहा कि अगन में
      रहती हूँ उनकी यादो से मगन में
      आँखों में बसी तस्बीर अश्को से धोली
      तू ही बता सखी कैसे खेलू होली .........

      वो आए तो सबर जाऊ में
      उन के प्रेम से बिगड़ जाउ में
      छूटा सा कुछ उनसे झगड़ जाऊ में
      बो मनाये और में करू ठिठोली
      सखी प्रिय संग ही खेलू होली .....

             देवेन्द्र " सागर "

 ***सजना होली में तुम आओना****



      सारे त्यौहार रस्मो के
      एक त्यौहार महोबत का "होली"
      होली में मुझ को गले लगाओ ना
      सजना होली में तुम आओना .......

      रंगो का त्यौहार है होली
      होली के रंगो में रांगजाओ ना
      बेरंग है जीवन रंगीन कर जाओना
      सजना होली में तुम आओना ....

      जलरहा है सारा बदन
     कैसी लगी ऐ प्रेम की अग्न
     प्रीत के रंग से इसे बुझाओना
     सजना होली में तुम आओना. .......

     मैं हूँ नासमझ समझुना
     नीला, पीला, हरा, लाल, गुलाबी, रंग अनेक
     रंगो कि भाषा समझाओ ना
     सजना होली में तुम आओना. ......

       दिल के रंग से मांग सजादो
       छूकर बदन दर्द मिटादो
       लेके बहो में बहोके झूले झुलाओना
       सजना होली मै तुम आओना .........

       मैं राधा बन कर नाचोगी
       सजना तेरे प्रेम राग में ,,,,,
       तुम कान्हां बनकर बांसुरी बजाओना
      सजना मुझको नचाओना
      सजना होली में तुम आओना. .......

           देवेन्द्र " सागर "

Thursday, April 17, 2014

बिन तेरे सब अधुरा

जिस तरह .........

बिन सुगंध के पुष्प अधूरे
बिन पत्तो के वृछ अधूरे
बिन कल-कल के झरने अधूरे
बिन ऊचाई के पर्वत अधेरे
बिन जल के नदियां अधूरी
बिन मिटटी के भूमि अधूरी
बिन चाँद के रात अधूरी
बिन बादल के बरसात अधूरी
बिन अश्क़ के अखियाँ अधूरी
बिन श्रंगार के दुल्हन अधूरी

        उसी तरह ...........

बिन तुम्हारे ,,,,,
     में अधूरा .....
     मेरा प्यार अधूरा ....
     मेरा जीवन अधूरा ......

देवेन्द्र " सागर "




नेता जी



   

      नेताओ  को  तो  बस  कमाई  चाहिए
      सच नहीं छूट और उसकी परछाई चाहिए
      बढ़ाये जो पैसो कि हबस बो दबाई चाहिए
      कर  सके   जनता   को   भ्रमित
      बादो  कि  ऐसी  सूची  हबाई  चाहिए ....

                देवेन्द्र " सागर "

Wednesday, April 16, 2014

दिलजले

             ~~दिलजले~~

आज उन्होंने इस दिलजले मिटाने की कसम खाई है
नादान है बो कही मुर्दों को भी मोत आई है.........

देवेन्द्र "सागर"

Tuesday, April 15, 2014

~दिलजले~

 
~~दिलजले~~

जमाना गुजर गया है उनसे न मिले
मेरे महबूब ऐसे गऐ की फिर ना मिले
भूल गऐ बो सारे कस्मोबादे
बना गए है आज बो हमें दिल दिलजले


~~~~ देवेन्द्र सागर~~~~~~


Monday, April 14, 2014

सपूत सुभाष





   ~~सपूत सुभाष~~

ऐ भारत के सपूत सुभाष
हिन्द फौज के कर्णधार
कहा खो गए .?
काल के किस कोने में
जाकर सो गए.?
देखो तो माँ भारती बेहाल है
जो स्वर्णिम सपने सजोय थे
गुलामी कि बेड़ियों को तोड़ने के
माँ को सजाने सबारने के
बेड़िया तो टूट गयी
पर माँ भारती को सबारेगा कोन.? .
माँ का हार कश्मीर
धुंदला सा पड़ता जा रहा है
उसके बिखरे मोती
पुरोहेगा कोन ...?
लोट आओ सपूत सुभाष
युबाओ के मन में
और खुशियां भर दो
माँ भारती के जीवन मै ....

देवेन्द्र " सागर "
०१-०४-२०१४ 

जहर

हर सजा कबूल है सकी गर बो सजा दे
शराब क्या नशा क्या जहर भी पीजाऊ
गर  बो  अपने  हाथो  से पिला  दे....
देवेन्द्र सागर

मिट्टी सा खिलौना




मेरा दिल मिटटी सा खिलोना
तुम को कितना भाएगा

रखना कदम आहिस्ता मेरी जिंदगी मैं
एक ठेस भी झेल ना पाएगा

ना रखा संभलकर गर
टूट कर बिखर जायेगा

खिलोना है भावनाओ का संवेदनाओ का
जो टूट गया एक बार तो फिर न जुड पाएगा

मेरा दिल मिटटी सा खिलोना
मिटटी में ही मिल जाएगा ......

देवेन्द्र " सागर "
०१-०४-२०१४ 

Saturday, April 12, 2014

वक़्त तो चाहिए

                       
        वक़्त तो चाहिय. .. 

एक बार ही करना होता दीदार तो बात और थी
ताउम्र देखना है ताबेरुखे यार वक्त तो चाहिए ....

सुनना होता इजहार-ऐ-महोब्बत जुबा से उनकी
तो बात और थी
महोब्बत में उतारना है उनको अपनी, वक्त तो चाहिए...

पाना होता जो जिस्म उनका तो बात और थी
जोड़ना हे अहसास धड़कनो से धड़कनो का
वक्त तो चाहिए ....

निभाना होता साथ कुछ देर का तो बात और थी
पाना है साथ जीवन भर का वक्त तो चाहिए ....

खोना होता जो हुज़ूम में तो बात और थी
खोजना है खुद को उन मै वक्त तो चाहिए .....

देवेन्द्र " सागर "
०६-०४-२०१४