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Friday, April 18, 2014

खण्डहर

बो जो देख लेती चाहत की नजरो से
तो हमारा भी रूठने का बहाना न होता
बो ही बो होती जिन्दगी की बस्ती में
ऐ खंडहर जमाना ना होता.......


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देवेन्द्र "सागर"
१८-०४-२०१४

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