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Sunday, April 20, 2014

संवेदनहीन इन्सान




जिन्दगी हर पल,
हर क्षण है हादसा
इन्ही हादसों का शिकार
खून से लथ-पथ
सड़क पर पड़ा इन्सान
मासूम सा अचेतन सा
फिर ना खड़ा हो सका इन्सान
किसी का बेटा
किसी का भाई
कीसी का पति
दर्द से तड़पता इन्सान
खुली-खुली, बंद-बंद
झपकती पलके,
अपनों से मिलने की ताकता राह
मन में सँजोय अधूरे
सपनो को पूरा करने की चाह
छटपटाता  सा व्याकुल सा इन्सान
देखता उसे हुजूम लगाये खड़े
उत्सुक से इन्सान
कोई पास जाता नहीं
उसको हाथ लगता नहीं
उसको कोई उठाता नहीं
बस एकटक देखता इन्सान
ऐ क्या हो गया कैसे हो गया
पहले तो नहीं था
इतना निर्दयी,निष्ठुर,
भावना विहीन
संवेदना हीन इन्सान....

देवेन्द्र "सागर"
१९-०४-२०१४

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