जिन्दगी से रूबरू न हो पाया
मौत कहती है मेरे शहर में आशियाना बनाले
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जब मौत की चाहत थी तो बो हम से खफा थी
आज जीने की आरजू है तो उसको महोब्बत होगई हमसे
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बो कहती है चाहत है तुम से
मौत कहती है महोब्बत है तुम से
या रब किसे रुसबा करू
एक मेरे बस में है और एक के बस में मैं हूँ.....
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मेरी मर्ग के बाद जनाजा निकले कू-ऐ-यार से
शायद उनसे दीदार-ऐ-मुलाकात हो जाए.....
देवेन्द्र "सागर"
Nice very very nice
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