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Sunday, April 20, 2014

मौत



जिन्दगी से रूबरू न हो पाया
मौत कहती है मेरे शहर में आशियाना बनाले

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जब मौत की चाहत थी तो बो हम से खफा थी
आज जीने की आरजू है तो उसको महोब्बत होगई हमसे

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बो कहती है चाहत है तुम से
मौत कहती है महोब्बत है तुम से
या रब किसे रुसबा करू
एक मेरे बस में है और एक के बस में मैं हूँ.....

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मेरी मर्ग के बाद जनाजा निकले कू-ऐ-यार से
शायद उनसे दीदार-ऐ-मुलाकात हो जाए.....

देवेन्द्र "सागर"


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