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Friday, December 19, 2014

ससुराल में पति



ससुराल में दामाद तब सब को भाता है
सासु माँ की हमेसा हाँ में हाँ मिलाता है

साले - साली के सारे नखरे उठता है
रोज सुबह सब को चाय बना के पिलाता है

पत्नी के मन लगाकर पैर दबाता है
पत्नी डांट दे तब भी मुस्कुराता है...

और कहता है मुझे देखो और समझो
काँटों में रहकर फूल सोचो कैसे मुस्कुराता है....

देवेन्द्र "सागर"
18/12/2014


Thursday, December 18, 2014

पाक आतंकी

मासूम बच्चो पर हुआ
आतंकी हमला बो
दर्द हमारा है.......

हर माँ तड़फती है
हर माँ सिसकती है
जो टुटगया आसमां से
बो किसी न किसी
माँ की आँख का
तारा है....

पाला है पाक सरकार ने
इन शैतानो को
अपनी ढाल बनाकर
बनाया अपना सहारा है....

इन्ही ढालो ने मासूम
फूलो का चमन
उजड़ा है....

ख़त्म न हो जाए
ऐ शैतान आतंकी
तब तक कैसे
घरसे बहार भेजू
लाल अपना
रहता है अबतो मुझको
हर वक़्त ख्याल तुम्हारा है....

देवेन्द्र "सागर"
१८/१२/२०१४



Sunday, December 14, 2014

""गरीबी""



खुशबू तो आती है रहीशो के वस्त्रो से
गरीवो में तो अक्सर महनत की वू होती है

महकता है आशियाना रहीसो के भोजन से
गरीवो के हाथो में तो बस भूक होती है

तुम तो रहते हो आशियाने में चैन से
गरीबो के सर रात ठण्ड दिन धूप होती है

उन्ही ने खड़ी की दीवारे उन्ही ने दी छत तुम्हे
उन्ही की चौखट पर गरीवी रोती है

क्यों इतराते हो बड़ी-बड़ी इमारतो पर
नीव में लगी ईट उन्ही के हाथो की होती है

देवेन्द्र "सागर"
12/12/2014

Saturday, December 13, 2014

बन जा भारत माँ का लाल


किसी की भरी है थाली
किसी की खाली है थाली
एक निवाला उसको डाल
बनजा भारत माँ का लाल

किसी के तन पर छ: कपडा
कोई ठण्ड से है जकड़ा
एक कपड़ा उसको भी निकाल
बनजा भारत माँ का लाल

किसी के बने भव्य महल
किसी की नहीं खपरेल
इनके लिए भी लगबा पंडाल
बन जा भारत माँ का लाल

किसी के पैसो से भरे खजाने
किसी के पास नहीं है आने
कुछ इन पर भी लुटले माल
बन जा भारत माँ का लाल

कमाले पुन: कहा मान हमारा
ऐ जिन्दगी न मिलेगी दोबारा
छोड़ मोह माया का जाल
बनजा भारत माँ का लाल

देवेन्द्र "सागर"
13/12/2014

Thursday, December 11, 2014

तू कहाँ है मेरी माँ

आज भी है अहसास
मुझे तुम्हारे कोमल
सुखद स्पर्श का
जब तुम फेरती थी
मेरे बालो में प्यार से
अपने हाथो की
कोमल उँगलियाँ
और में भूल कर सब कुछ
जन्नत का अहसास
करता था
कहाँ खो गया बो
सुखद स्पर्स
याद करता हूँ तो
कुंठित होती है मेरी जाँ
तू कहाँ है मेरी माँ
तू कहाँ है मेरी माँ

"सागर"
08/12/2014


Monday, November 3, 2014

दुल्हन फोजी की

                  ~~हाइकु~~

                    छोड़ गया है
                सजि सेज मेरी वो
                    क्या करू मैं

                    मिलना पाई
                सरहद चला वो
                    घबराऊ मैं

                    आना तू जल्दी
                नष्ट कर दुश्मन
                    धीर धरु मैं

                    खुस हो जाऊ
                जाके वीर बाहों में
                    इठलाऊ मैं

                    गर्व तुम से
                तुम्हारी ही पत्नी जी
                    कहलाऊ मैं

                देवेन्द्र सगर "सागर"
   
             

Friday, October 24, 2014

गोबर्धन



कहे ब्रज की प्रजा सारी
रूठे इंद्र गुस्सा बहुत भारी
बादल गरजे विजली चमके
मची ब्रज में खूब आहकरी

फटे बादल वर्षे पानी
देख क्रोध देव इन्द्र का
ब्रज प्रजा है थर्रानी
घबराई प्रजा चिल्लानी

बड़ा वाल कृष्ण खड़ा आगे
मैं हूँ डरो नहीं नाही कोई भागे
उठाया ऊँगली पर्वत गोवर्धन
बुलाये नीचे ब्रजवासी सारे

बाल ना बाँका हुआ किसीका
देव इंद्र खूब रहे पश्च्ताये
तोड़ घमण्ड देव इन्द्र का
मुस्काये और गोबर्धन पूजबाये...

देवेन्द्र सगर "सागर"
24/10/2014

Tuesday, October 14, 2014

साईकिल



रही बचपन से साथ तेरे में
घुमती रही फिरती रही
धुप में छाँव में
तुम को समेट कर अपनी बाँहों में.....

तेरे हाथो में अपने हाथो को थमा कर
अपने पाँव पर तेरे पाँव जमकर
चलती रही निरंतर तेरे साथ में....

गिरते साथ में उठते साथ में
और फिर सम्हाल कर
हो जाते थे तैयार चलने के लिए
पकड़कर एक दूजे को
धूमिल हाथ में........

आज मुझसे ज्यादा
चमकती-दमकती तुझे कोई
नई मिल गई जीवन के पथ पर
तेरे साथ दौड़ने को......

तो तुम भूल गए मुझ को
और छोड़ गए बेकार समझ कर
अपने तहखाने में
आहिस्ता-आहिस्ता मरने को.....

आज जरुरत है मेरे
अस्तित्व को बचने की
मैं सहायक हूँ श्रष्टि को
बचाकर तेरा साथ निभाने की....

समझो तो मैं तुम्हारे लिए दिल हूँ
मैं बोही बचपन बाली तुम्हारी
प्यारी साईकिल हूँ...साईकिल हूँ...

देवेन्द सगर "सागर"
१३/१०/२०१४

"आदमी"


गलतियों का पुतला है आदमी
आदमी आदमी ही क्यूँ रहता
आदमी फिर खुदा ना होता.....
फितरत है भूलने की आदमी को
समझता सब आदमी तो
आदमी आदमी से जुदा न होता.....

देवेन्द्र "सागर"
13/10/2014

Sunday, October 12, 2014

सरहद पर पीया मेरे


चाँद भी निहारता है मेरे पिया को
देता है दुआए धडकते जिया को
बो खड़ा आज भी बना सरहद पहरी
जब पूज रही तुम सब अपने पिया को

देवेन्द्र "सागर"
12/10/2014

Monday, September 22, 2014

बेचारा पति

~~बेचारा पति~~
झाड़ू लगबाले, पूछा लगबाले
बर्तन भी धुलबाऊगा, पति हूँ तेरा
पति ही कहलाउगा.....

आटा गुन्दबाले, रोटी सिकबाले
सब्जी भी बनाउगा, पति हूँ तेरा
पति ही कहलाउगा....

बच्चो को नहलबाले, कपडे भी धुलबाले
तुझको भी नहलबाउगा, पति हूँ तेरा
पति ही कहलाऊगा....

हाथ भी दबबाले, पैर भी दबबाले
लोरी गाके सुलाउगा, पर ये न भूल
पति हूँ तेरा पति ही कहलाउगा.....

घर में कर लाख अत्याचार
बहार तो मैं ही रॉब दिखाउगा
क्यों की पति हूँ तेरा
पति ही कहलाउगा......

देवेन्द्र "सागर"
22/09/2014


Thursday, September 18, 2014

यूँ ही तड़फता रहे


गर किस्मत में नहीं तू मेरे लिए
फिर क्यूँ धडकता है दिल तेरे लिए....

तेरी धड़कनो को अहसास नहीं मेरा
फिर क्यूँ तड़फता है दिल तेरे लिए....

लवो से जब कोई नाम ले जो तेरा
तो क्यूँ भड़कता है दिल तेरे लिए....

गर तड़फना ही है महोब्बत की तासीर
तो तड़फता रहे यूँही मेरा दिल तेरे लिए...

देवेन्द्र "सागर"
१८/०९/२०१४


Monday, September 15, 2014

"हिन्दी"

           "हिन्दी"


देखो हिन्दुस्तान में
हिन्दी का दुर्भाग्य
खुद के अस्तित्व के लिए
लड़ना पड़ रहा है......
हिन्दुस्तान में ही हिन्दी दिवस
मनाना पढ़ रहा है....
दिखाने खुद को विद्ध्यवान
क्यूँ हिन्दी के बीच में
अंग्रेजी जड़ रहा है......
रोता हिन्दी में,,,
हँसता हिन्दी में,,
सोचता हिन्दी में, फिर क्यूँ
बिन अंग्रेजी खुद को
तुक्ष समझ रहा है....
आज पूरा विश्व लगा देवगिरी लिपी
पर शोध करने
ऐ मूर्ख फिर क्यूँ तू
हिन्दी से डर रहा है......
और क्यूँ अंतरमन से
अंग्रेजी के लिए झगड़ रहा है.......
नारी का श्रंगार पूर्ण हो
लगाकर बिन्दी....
तुम भी बन जाओ पूर्ण
हिन्दुस्तानी हस्ताक्षर कर हिन्दी...
जय हिन्द जय हिन्दी

देवेन्द्र "सागर"
१४-०९-२०१४

Wednesday, September 10, 2014

खुबसूरत नागिन

कास में ना करता उससे महोब्बत
ना बो मेरे दिल में बस्ती.......

ना होता मैं उसका दीवाना
ना बो नागिन बन कर डसती.....

बो एक खूबसूरत नागिन ही थी
जिसने करके मेरी जिन्दगी बीरन

ऐसे बना दिया जैसे जिन्दगी हो
"सागर" में डूबती कश्ती....

देवेन्द्र "सागर"

Tuesday, September 9, 2014

तुम तुम्ही हो या और कोई

जिन को देखा करते थे ख्बाबो में
मालूम नहीं तुम बो ही ही या और कोई

जो अप्सरा सोते से जगाती थी स्वप्न में
मालूम नहीं तुम बो ही हो या और कोई

कल्पनाओ के ताने-बाने बुना करते थे मन में
मालूम नहीं तुम बोही हो या और कोई

जिन के लिए हर पल बेचेन रहा करते थे
मालूम नहीं तुम बो ही हो या और कोई

दिल चाहता है तुम्हे देखते रहे हर दम
कोई भी हो बड़ी कमसिन हो तुम

देख कर आँखों पर यकीन ना रहा
मालूम नहीं तुम तुम्ही हो या और कोई...

देवेंन्द्र "सागर"
06/10/1995

Sunday, August 31, 2014

मनाऊ कैसे


दर्द है कितना बताऊ कैसे
दास्ताँ दिल की सुनाऊ कैसे

"दिया" तो है पास मेरे
बिन बाती जलाऊं कैसे

करते नही अब प्यार हमसे
दर्दे दिल बताऊ कैसे

कैसे जला आशियाना मेरा
लगी आग अब बुझाऊ कैसे

हुई खता क्या बताओ जरा
उलझी गुत्थी सुलझाऊ कैसे

रूठ गई तो कोई बात नहीं
बस इतना बताओ मनाऊ कैसे

देवेन्द्र"सागर"
३१-०८-२०१४



Friday, August 29, 2014

ख़त तेरी तहरीर का


ख़त तेरी तहरीर का किताब में मिला पुराना
याद आगया मुझे बो मेरा गुजरा जमाना

गिला लिखा ना शिकबा लिखा बस प्यार लिखा
लिखा खुद को लैला मुझ को मजनू दीवाना

बो तेरी बू-ऐ-वदन ख़त में आज भी है बरक़रार
तेरा हर अक्षर गुन गुनता तेरा  प्यार का फसाना

फिर खतो में जीने लगी मेरी प्रेम कहानी
आज भी दिखता है इन में तेरे अश्को का पानी

याद आगया प्यार बाला बो मौसम सुहाना
बो बागो में बुलाना तेरा सिर रखकर सोजना

रखे ख़त सरे किताबो में जैसे वेसुमार खजाना
याद आता है तेरा खत पर होटों के निशा लगाना

देवेन्द्र "सागर"
२९-०८-२०१४

Thursday, August 28, 2014

प्यास

     
     बो प्यार के लम्हों को 
     फिर से जीना चाहता हूँ....
     तू प्यास है जिन्दगी की
     आ तुझे में पीना चाहता हूँ...

     देवेन्द्र "सागर"

Sunday, August 24, 2014

गरीबी


इस बेरहम दुनिया मे ढूढ़ते है
आशियाना कोई......
खाने को दो वक़्त का भोजन
रहने को ठिकाना कोई.....

ठण्ड से हे  जकड़े ,
तन पर नहींकोई कपड़े ....
उनसे माँगने को उतरन
सोचते है बहाना कोई......

ना देखते ख्बाब अमीरी के
ना चाहत है पैसो की.....
बस लुटा दे हमपर बेसुमार
प्यार का खजाना कोई.....

देवेन्द्र "सागर"
२४-०८-२०१४

Thursday, August 21, 2014

एहसास


वेबसी,बेहयाई के घुंगरू
पिरोह कर
पहना दिया गहना पैरो का.......

भरोषे का सिला नबाजा
तुमने
बनाकर खिलौना महफ़िल
में गिरो का....

हँसती रही हँसाती रही
नाचती रही गाती रही
खुद का दिल रुलाकर
बहलाया मेने ओरो का......

पछता रही हूँ अपनी
महोब्बत पर
क्यूँ देखा था खुआब
शहरो का.....

गम गुसारी मिलता
नहीं कोई
ए तो शहर है गुंगो-
बहरो का........

किस हुजूम में खो गयी
मुज्तरिब है दिल
"सागर" अब ना भरोसा करना
अपना समझकर गिरो का......

वरना बेच देगा तुझे भी कोई
फिर खाता रहना थपेड़ा
पश्चाताप की लहरों का......

देवेन्द्र "सागर"
२०-०८-२०१४


Sunday, August 17, 2014

तडफता दिल

तडफता रहा दिल ये मेरा
तडफता हुआ ही छोड़ गया

दिल तो सिर्फ दिल ही था
खिलौना समझ कर तोड़ गया

बो क्या जाने दर्द किसी का
जो देके दर्द  और  गया

घावो से भरा जिस्म मेरा
बो एक और जख्म जोड़ गया

कैसे होगा ख़त्म सफ़र जिन्दगी
बो जीवन का ही रुख मोड़ गया

देखी थी वफा हरदम जिसमे
बो वफा का आइना ही तोड़ गया

  देवेन्द्र "सागर"
17-08-2014

raakhi


राखी का धागा है कच्चा
पर इस से बंधा भाई-बहन
का प्यार है पक्का..
देता वचन भाई
मरते दम तक करुगा रक्षा....

ए मेरे भाई आज प्यार-दुलार
का ये धागा टूट रहा है....
ये जिश्म का भूका भेड़िया
कैसे-कैसे तुम्हारी बहन को
लूट रहा है.....

कब तक इन से डरो गे
कब तक और धेर्य धरो गे
कब तक देखते और
सुनते रहो गे
क्यों नहीं तूम्हारा
सब्र का बांध टूट रहा है....

कभी तुम्हारी बहन को
रोंदा जाता है....
कभी उसके अंगो को
भेदा जाता है.....
कभी नग्न करके
फेका जाता है....
कभी पेड़ो पर निर्वस्त्र
लटका दिया
जाता है.........!!
उस पेड़ की डाली
भी शर्म से
झुक जाती है
ये तुम से कैसे
देखा जाता है......
भाई तुम्हारा रक्षा हेतू
वचन टूटे ना....
अब कोई दरिंदा तुम्हारी
बहन को लू टे ना....

कब तक अचेतन रहोगे
जागो भाई....
बहन की अस्मिता पर खतरे को
भंपो भाई...
बहन बहन होती है
अपनी हो या पराई....
तुम्हे आज राखी की है
दुहाई...
बन क्रष्ण जो अपनी
बहन की
लाज न बचाई.....

देवेन्द्र "सागर"
०६-०८-२०१४






Monday, August 4, 2014

शेर


सरगिराँ ना हो
मेरी महोब्बत से,
दिल में ना सही
घर में रहने दे
संग-ऐ-आस्ताँ
बनकर.....
देवेन्द्र "सागर"


Saturday, August 2, 2014

बाल विवाह


कर के बाल विवाह क्यों
     बच्चो पर अत्याचार करते हो
पढने-खेलने के दिन हे क्यों
     बचपन से खिलबाड़ करते हो
जन्म दाता माँ-बाप हो उनके
      नफरत करते हो या प्यार करते हो

~~~~~~~~~~~

माँ छोटी बहुत लडो तेरी
तुझे छोड़कर कैसे जाऊँगी
रो-रो कर मर जाऊँगी
अभी विवाह नहीं करबाउगी

             रो-रो कर मर जाऊँगी
             माँ विवाह नही करबाउगी

उठता नहीं बस्ते का बोझ
गिरस्ती का बोझ कैसे उठाउगी
लिखना-पढना सब छूटेगा
मैं अनपढ़ ही रह जाऊँगी

           रो-रो कर मर जाऊँगी
           माँ विवाह नहीं कर बाउगी

यहाँ खाना माँ तू पकाती
हाथो से अपने मुझे खिलाती
जल जाऐगे मेरे नन्हें हाथ
मैं खाना कैसे पकाउगी

           रो-रो कर मर जाऊँगी
           माँ विवाह नहीं करबाउगी

माँ अभी तू लोरी गाती
मैं रख सर गोदी मे सोजाती
डर जाती तेरी लाडो परछाई से
वहाँ तुझबिन कैसे रहपाउगी

           रो-रो कर मर जाऊँगी
           माँ विवाह नहीं करबाउगी

माँ कली हूँ तेरी बगिया की
खिल के शोभा बडाऊँगी
खिलने से पहले टूट गई तो
यूँ ही मुरझा के रह जाऊँगी

           जीते- जी मर जाऊँगी
           माँ विवाह नहीं कर बाउगी

माँ कहते है लोग कई
बाल विवाह अपराध बड़ा
तेरी माँ अपराधी है
ऐ कैसे मैं  सुन पाउगी

           रो-रो कर मर जाऊँगी
           अभी  विवाह नहीं करबाउगी

देवेन्द्र "सागर"
०१-०८-२०१४


Thursday, July 31, 2014

क्यों की मैं अछूत हूँ



भविष्य नहीं मैं भूत हूँ
क्यों की मैं अछूत हूँ
चाहे जितना हो हुनर मुझ में
फिर भी करतूत हूँ
क्योकि मैं अछूत हूँ
एकलव्य हूँ मैं
छल का सबूत हूँ
क्योकि मैं अछूत हूँ
कहे जग दानवीर कर्ण मुझे
ममता भी अपना ना
पाई मुझे कुन्ती का
बड़ा पूत हूँ
क्योकि मैं अछूत हूँ
बन रानी लक्ष्मी लड़ी खूब
समर में अंग्रेजो से
मैं झलकारी हूँ
वीरता की मूर्त हूँ
इतिहास के पन्नो में दबी पड़ी हूँ
क्यों की में अछूत हूँ
आकर एक है
रक्त एक है
कहने को तो
भारत माँ का सपूत हूँ
फिर भी सबसे अलग हूँ
अस्पर्स हूँ
क्यों की में अछूत हूँ

देवेन्द्र " सागर "
३१-०७-२०१४


Saturday, July 26, 2014

जिन्दगी


गैरो से लड़ना होता तो दमभर लड़ता
खुद से लड़ रहा हूँ ,जंग है जिन्दगी
तू नहीं तो कैसी बेरंग है  जिन्दगी
मयकदा सूना है सूनी है जिन्दगी....

तुझ में ही जी रहा था तुझमे ही जी रहा हूँ
लेके तेरा नाम जाम पर जाम पी रहा हूँ
कटघरे में खड़ा हूँ अदालत लगी मौत की
दोषी  हूँ  मैं  या  खुनी  है  जिन्दगी....

कभी मुझमे हुआ करती थी जिन्दगी
आज मुझ से झिझक रही है जिन्दगी
देखो किस तरह सिसक रही है जिन्दगी
धीरे-धीरे मुझसे खिसक रही है जिन्दगी..

देवेन्द्र "सागर"
२६-०७-२०१४

Friday, July 25, 2014

एकलव्य


         "एकलव्य"

वनों का था वनबासी
जो सभ्यता में था सभ्य,,,
था वीर धनुर्धर बो एकलव्य,,,

क्या वनबासी होना
था उसका अपराध,,,,
क्या इसी लिऐ नहीं था
बो गुरुशिक्षा का हकदार,,,,

छला द्रोण ने
फिर भी पंहुचा अपने
गंतव्य,,,,
खीच बाण उंगलियों से
धर्मयुद्ध में बना 
श्रेष्ट धनुर्धर एकलव्य,,,

माँगा जो द्रोण ने
अंगूठा दांए हाथ का
दे दिया गुरु मान कर,,,,
चला सकुगा ना वाण कभी,
गुरु दक्षिणा दी ये जान कर,,,,

शिष्य परम्परा में अमर हुआ,
था द्रोण से जिसका
व्यक्तित्व भव्य,,,,
था बो वीर धनुर्धर 
एकलव्य,,,

देवेन्द्र "सागर"
२५-०७-२०१४


Wednesday, July 23, 2014

तुम्हारी ये आँखे


कितनी खूबसूरत है
तुम्हारी ये आँखे.....
मुझे दीवाना बना गई
तुम्हारी ये आँखे....
मेरी आँखों से नीद
चुरालेगइ
तुम्हारी ये आँखे....
दिल की बात इशारो
में समझा गई
तुम्हारी ये आँखे....
लोग जाते है मय पीने
मयखाने
नशा-ए-खुम करागई
तुम्हारी ये आँखे....
कैसे करू शुक्रिया इनका
मेरी दुनिया को जन्नत
बनागई
तुम्हारी ये आँखे....

देवेन्द्र "सागर"
01-04-2001



मेरा बचपन


♡♡ मेरा बचपन पुराना ♡♡


धुंदली सी यादें रहगई है अब नजरो में
जिसे देखे हुऐ बीत गया एक जमाना
आज शहर कि चार दीबारियो में
बो जाने कहाँ खोकर रह गया है
बचपन का मेरा अपना जमाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना ....

बो बचपन का रोना रोते-रोते सो जाना
गांव कि धूल में भागना ओरो को भगाना
पेड़ पर चढ़ना चढ़कर कूद जाना
पेड़ पर छुपना छुपकर चिल्लाना
बो पूँछाले बाली पतंगे उड़ाना बो पेच लड़ना
याद आता है मेरा बचपन पुराना

याद आता है गांव में वर्षात का आना
गड्डो के पानी को छप-छप करके उचकाना
पानी में भीगना और भाग-भाग कर नहाना
बो कागज कि नाव चलना डूबने पर रूठ जाना
बो गांव कि कीचड़, कीचड़ में कूद जाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ...

याद आती है बो चूल्हे कि रोटियां
बो अष्ट - चंगा कि गोटियां
बो पुराने गिल्ली - डंडा के खेल
बो माचिस कि डिब्बियों कि रेल
जहेन में आज भी है बो दादी के
किस्सो का खजाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ...

याद आता है दूर पहाड़ियों पर जंगल
बो मेलो में पहेलबानो का दंगल
बो मुर्गे -मुर्गियों का आपस लड़ना
बो बैलगाड़ियों का दौड़ में भगाना
बो बंदूको से गुब्बारों पर निसाना लगाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ....

याद आती है बो चिड़ियों कि चहक
खेतो में भीगी-भीगी मिट्टी की महक
बो लहराती फसलो कि हरियाली
बो भोर के सूरज कि लाली
बो बदलो कि घटा काली
बो स्कूल न जाने का झुटा सा बहाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. ........

सिमट गयी बो यादें मेरे ही मन में
कही खोगया मेरा बचपन मेरे ही तन में
कहाँ गई बो छोटी-छोटी कतरो बाली चिड़िया
दिखती है तो बस ऊँची-ऊँची इमारते गगन में
क्या करे कैसे समझाए मन "सागर" दीवाना
याद आता है मुझे मेरा बचपन पुराना. .......

देवेन्द्र " सागर "
२५-०२-२०१४


Monday, July 21, 2014

प्रिय मानसून


तरस रहे थे नयन
तुम्हे देखने को
प्रिय "मानसून"
आकर मन को
स्नेह से भर दिया.....

बरसाया जो
प्रेम-सागर धरा पर
उढ़ा चुनर
हरियाली की
धरा को ममतत्व से
भर दिया.......

वीज हुए अंकुरित
कली बन फूल
महक उठे बागो में
सूखे, कटे वृछो में भी
'प्राण' फिर से धर दिया....

भर जल-अमृत से
सारे नदी सरोबर
प्राणी जीवन धन्य कर दिया.....

देवेन्द्र "सागर"
२१-०७-२०१४



Sunday, July 20, 2014

नगरबधू

ज्यो - ज्यो रात होती है
जुल्मो की बरसात होती है

बेच दिया सौहर ने मुझको
कहाँ अब उस से बात होती है

अब हर रात बनती दुल्हन में
माँग मेरी हर रात उजड़ती है

अब मिलते है सब सौहार बनकर
जिस जिस से मुलाकात होती है

मैं जीते-जी मरती हूँ हर रोज
जब जिस्म लूटने की शुरुआत होती है

मैं सहती जिल्लत भूख मिटाने को
उनकी भूक मुझसे मिटती है

बो तृप्त होके चले जाते है
आत्मा मेरी हर रात रोती है

कहते है समाज की गंदगी हूँ मैं
हर रात क्यूँ न्यौछावर समाज होती है

गर सरीफो का शहर है ये तो
जिस्मफरोशी की क्यूँ बात होती है

देवेन्द्र "सागर"
१९-०७-२०१४





बरसात


   जब जब बरसात का महीना आता है
   जाने क्यूँ दिल बेकाबू हो जाता है

   बरसे मेह जब तड़-तड़ गरजे बदल
   जाने क्यूँ मेरा दिल घबराता है

   ज्यूँ - ज्यूँ बुँदे गिरे बदन पर
   कर तन ठण्डा मन में अग्न लगता है

   ले बहो में प्रयसी तू भी वर्षा प्यार जरासा
   मन की अग्न बुझाले कह कह उकसाता हैं

   कप कपाता बदन करलेती जब आलिंगन
   गेशुओ से झरता पानी होटों का कम्पन भाता है

   मिलते दो दिलो को और करीब लाता है
   जब-जब बरसात का महिना आता है

    देवेन्द्र "सागर"
    १९-०७-२०१४



Friday, July 18, 2014

हायकू प्यार तू


 मेरा प्यार तू
प्रेम का संसार तू
 है आधार तू

 तुझसे ही है
दिल का धड़कना
 धड़कन तू

 पलके खोलू
तो नजर आए तू
 आँखों में है तू

 पलके बंद
सपनो में आए तू
 सरमाए तू

 देखू आयना
दिखे सिर्फ-सिर्फ तू
 मेरी शक्ल तू

 लू जब सांसे
मन महकाए तू
 यूँ समाए तू

 तुझ में हूँ मैं
एक है तू-मैं, मैं-तू
 मुझ से है तू

 मेरे लिए है
एक रहनुमा तू
 एक खुदा तू

देवेन्द्र "सागर"
१८-०७-२०१४




Thursday, July 17, 2014

सपूत "आजाद"




जन्मा जो भारत माँ का मान बढाने
बो भारत माँ का सपूत "आजाद"था

कैसे रहता बंधन में पंक्षी स्वतंत्र गगन का
चिड़िया नहीं, चील नहीं, बो  तो वाज था

स्वतंत्र परिन्दे जैसा जिया जीवन जिसने
बो भारत माँ का सपूत  "आजाद" था

लड़के लेगे आजादी किया जिसने शंखनाद था
बो भारत माँ का सपूत  "आजाद"  था

अंग्रेजो का जो लूटा बड़ा खजाना
थर्राए फिरंगी किया वीरता का काज था

भारत के कण-कण को भी जिसपर नाज था
बो भारत माँ का सपूत  "आजाद"  था

नापाक हाथ कोई छूए शरीर को
कहाँ ऐ उस वीर को बर्दास्त था

मारे मुझे कोई औकात भला क्या उसकी
बो माँ का शेर भरे वीरो सा सहास था

लड़ते-लड़ते चुनी खुद ही मौत
बो कहाँ यमराज का मोहताज था

लिख गया इतिहास आजादी का 'लहू' से
बो भारत माँ का सपूत "आजाद" था

देवेन्द्र "सागर"
१७-०७-२०१४


Wednesday, July 16, 2014

जिन्दगी क्या है


जिन्दगी क्या
जीवन के रंगमंच पर
कठपुतलियो का नृत है
डोर है कोई और खिचता
दीखता सिर्फ हमारा कृत है
मनुष्य यूँ ही करता गर्भ शरीर पर
शरीर मात्र उसका भ्रत है
फेला भ्रम सर्वत्र यहाँ
कुछ है तो बस मृत्यू ही सत्य है

देवेन्द्र "सागर"
१४/०७/२०१४


Thursday, July 10, 2014

ना आओ मेरे शहर



ना आओ मेरे शहर तो अच्छा ही है
मेरे शहर के हालत बदल गए.....

टूट पड़ते है औरतो पर चील-कौओ की तरह...
इंसानियत बाले लोगो के ख्यालात बदल गए....

मानभंग कर निर्वस्त्र लटका देते है पेड़ो पर लाशे
संवेदनाए ख़त्म हुई लोगो के जज्बात बदल गए...

खो गए रिश्ते-नाते चकाचौध की भीड़ में
कर खून विश्वास का वो हर बार बदल गए....

बो दिल बदल गए बो लोग बदल गए
ना आओ मेरे शहर के हालात बदल गए....

देवेन्द्र "सागर"
०९/०७/२०१४


Friday, July 4, 2014

दर्दे दिल



बने थे जो हमारे लिए महोब्बत-ऐ-गुलिस्ता
आज बो वीरान-ऐ-दश्त हो गए....

मिलते थे जो हमसे होकर गाफित हर वक़्त
बो हमारे लिए अब वेवक़्त हो गए....

संजोये थे महोब्बत में सपनो के ताने-वाने
बो बेगाने सपने पुराने लख्त-लख्त हो गए..

देवेन्द्र "सागर"
04/07/2014

वीरान-ऐ-दस्त= उजड़े जंगल
गाफित = बेखबर
लख्त-लख्त = टुकड़े-टुकड़े


Friday, June 20, 2014

~~प्यार में दर्द बहुत है~~



जो कहते है हमसे प्यार बहुत
बो देते है हमको दर्द बहुत
साथ रहते है बो हमारे 'हरदम'
फिर भी हमेशा है दूर बहुत

उतारा नहीं हमे कभी दिल के पैमाने में
बिन पिये कह दिया साकी कडबा तेरा जाम बहुत
हमे देख कर दर्द में, आता है उन्हें मजा बहुत
हँसता मैं रोता दिल, ऐ दिल्लगी की सजा बहुत

चलते है बो पकड़ कर हाथ मेरे साथ
बिखेरते हुए कांटे इन काँटों की चुभन बहुत
कैसे कटेगा जिन्दगी का ऐ सफर
बाँकी अभी गुमनाम रहो पर सफर बहुत

देवेन्द्र "सागर"
१९/०६/२०१४


Tuesday, June 17, 2014

मेरे पास नहीं है पापा

जब भी सुनता हूँ 
दो अक्षर 'पा''पा'
गूंज कर अंतरमन में
विलीन हो जाते है
क्या है इन अक्षरों की
सार्थकता....?
बस मैं ढूंढता रहजाता हूँ
और सुनकर इन अक्षरों को
भावविभोर हो जाता हूँ
एक धुंदली सी तस्वीर
ऊँगली पकड़ के घुमाते हुऐ
उभर आती है कभी भी
हिर्दय पटल पर 
जो कभी देखी होगी
नन्ही सी आँखों ने
कर जाती हैं मुझे निशब्द
क्या है "पापा"....?
मैं नही कह सकता
क्योकि मेरे पास नहीं है "पापा"

   

देवेन्द्र "सागर"

17/06/2014

Friday, June 13, 2014

~~वृक्ष~~


~~वृक्ष~~

ना काटो मुझे भी दर्द होता है
जीवन मुझसे ही है
जीवन मुझ में भी है
दिल मेरा भी रोता है
रक्त मेरा भी बहता है
रक्त्वाह्नियों से
क्यूँ जुदा करते हो मुझे
मेरी ही टहनियों से
मेने बचपन देखा है
तेरे दादा का
वो अल्हड़पन, लड़कपन
तेरे पापा का
डालकर मुझ पर झुला
तुझ को खूब झुलाया
जब खेल-खेल कर थका तू
तब देकर सीतल समीर मेने
तुझ को ख़ूब सुलाया
सूरज ने मोसम को तपिस से अपनी
जब-जब गरमाया
तब-तब बुला बादलो को मेने
तेरे अँगन में खूब वर्षाया
जो टाहेनिया मेरी सूख गई, टूट गई
सर्दियों में खुदको जलाकर
तेरा बदन तपाया
जब-जब मैं फला-फुला
तूने मेरा ही फल खाया
बन औषधियाँ मेने ही
तेरा जीवन बचाया
मेरी ही वायु साँस बनकर
दमका रही है तेरी काया
मिटगाया श्रष्टी से मैं तो
ये बादल कैसे कड़केगा
बिन पानी ये झरना कैसे ढारकेगा
ऐ मनुष्य बता नहीं होगी वायु
तो तेरा दिल फिर कैसे तेरी
प्रियसी के लिए धड्केगा
निस्वार्थ खड़ा मैं एक वृक्ष हूँ
तेरा जीवन हो सार्थक
इसलिए तेरे समक्ष हूँ....!

देवेन्द्र "सागर"
१३-०६-२०१४




Thursday, June 12, 2014

~~मेरे सबाल आप से~~


~~मेरे सबाल आप से~~

कब तक में अजन्मी रहूगी
कब तक कोख में दमन होता रहेगा..?

ख़त्म हो जाएगा अस्तित्व मेरा
कब तक भारत सोता रहेगा..?

कब तक में अनपढ़ रहूगी
कब तक बेटा-बेटी भेद होता रहेगा..?

कब तक ऐ मनुष्य पाप के बीज बोता रहेगा
कब तक बाल विवाह के नाम पर मेरा
शोषण होता रहेगा.....?

मैं दुल्हन तेरी कब तक पराई बनाता रहेगा
कब तक दहेज़ की चिता में जलाता रहेगा..?

कब तक अस्मिता मेरी लुटती रहेगी
कब तक माँ का दूध शर्मसार होता रहेगा..?

कब तक बासना की होली खिलती रहेगी
कब तक दामन दागदार होता रहेगा....?

नजर आते है चीर खीचते अनेको दुशासन
हाँ बहेन सुरक्षित हैं तू मेरी क्ष्त्रछाया में..!

दाग लगा ना पएगा कोई रहते मेरे तेरी काया में
हाँ बहेन हैं तू मेरी तेरा भाया में..!

कोन भाई क्रष्ण बन कर ये कहेगा...?
कोन शिव बन कर साथ मेरे रहेगा...?

देवेन्द्र "सागर"
१२-०६-२०१४


Wednesday, June 11, 2014

~~स्कूल चले हम~~



~~स्कूल चले हम~~

आओ शिक्षा की लौ जलाए
अज्ञानता के अंधकार को भगाए

गांव गांव बस्ती बस्ती जाए
घर - घर शिक्षा पहुचाए

जहाँ नहीं है पाठशाला
बन शिक्षादूत हम उन्हें पढाए

जीवन का सबसे बड़ा
पुण्यकार्य कर धन्य हो जाऐ

एक निर्धन बच्चे को शिक्षित
करने का व्रत उठाए

बात कहे हम सच्ची
बच्चा अज्ञान रहे ना बच्ची

राष्ट्र भक्त बनेगा सच्चा
गर पढालिखा होगा हर बच्चा

मानवता का पाठ पढाए
स्कूल चले हम अभियान चलाए

देवेन्द्र "सागर"
११-०६-२०१४



Saturday, May 31, 2014

बाल मजदूरी



कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है
चाहते है हम भी सुन्दर बन कर रहना
पर इच्छाओ को कर के दमन
उन से लड़ना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

ढोकर कचरा पैसे लाते
बापू उन्हें सराब में उड़ाते
ढोने कचरा जिस दिन नहीं जाते
मार उनकी खूब सहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

माँ मेरे बापू से खूब पिटती है
जवानी में ही बुढ़ीसी लगती है
बो भी घर-घर वर्तन धोती है
दिनभर करती कम रातभर रोती है
फिर भी साथ बापू के रहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

लाती माँ दो पैसे भूख मिटाने को
उस से भी चूल्हा जलता नहीं
तब इच्छाओ की आहूति देकर
जिस्म जलाना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पढता है

कोई आता नहीं मेरे बापू को समझाने
कोपी किताब और बस्ता मुझे दिलाने
समझता नहीं कोई मेरी बाल इच्छाओ को
मैं भी जीना चाहती हूँ तुम्हारी तराह कहना पढता है
कचरा ढोना काम नहीं गबारा मुझे
पर क्या करू करना पड़ता है

गरीबो के यहाँ तो मैं पैदा हो भी जाती हूँ
अमीरों के यहाँ तो कोख में ही मरना पड़ता है
जिन्दगी यूँ ही निकलती समझोतो में
बेटी हूँ इस लिऐ मुझे सब सहना पड़ता है
कचरा ढोना गबारा नहीं मुझे
पर क्या करू करना पढता है......

देवेन्द्र "सागर"
३१-०५-२०१४



Monday, May 26, 2014

धड़कन




      हमने तो सिर्फ तुम्हारी धडकनों में जिया है..।
      पर क्या करे महसूस आपने आज किया है..।।
      २६-०५-०१४

      मेरी धडकनों में हे तू, अहसास तो कर..।
      तुझ में मैं मुझ में सिर्फ तू विश्वास तो कर..

      देवेन्द्र "सागर"
      २४-०५-२०१४


Saturday, May 24, 2014

~तेरा चहरा~


लगता है कितना भोला कितना प्यारा
पर है नहीं इतना माशूम तेरा चहरा

जताती हो प्यार जो बेसुमार हमपर
जानते है इसमें फरेब छुपा बहुत गहरा

कैसे समझू तुझको तेरी महोब्बत को
हर तरफ लगा रखा है साजिसो का पहरा

जो तीर दागे तूने नफरतो के प्यार से
किस को दिखाऊ बो जख्म दिया हुआ तेरा

"सागर" दाग-ऐ-दिल धोए कैसे..?
मेरी आँखों का पानी आँखों में ठहरा

देवेंन्द्र "सागर"


Friday, May 23, 2014

"फूल पलाश का"

"फूल पलाश का"

आफताब की चिलचिलाती धूप
घबरा जाते है सभी देख गर्मी मै
ज्वलित तपिस रूप
डर से उसके डर जाते है
नहीं जो सामना करपाते है
सूख जाते है बो पत्ते-पत्ते और वृछ
टिकना पाते उसके समक्ष
आफताब की ज्वाला में जलजाते
न जाने ऐसे कितने वृछ
जो उस से डटकर लड़ता है
जो उसकी ज्वाला में जलकर खिलता है
संघर्षो में भी मुस्कुराना
है जिसका सिद्धांत मूल
वो वृछ पलाश और उसका फूल
प्रकर्ति हमे सिखाती है
जीवन एक संघर्ष है
संघर्षो से न घबराना
जीवन की तपिस में बन फूल पलाश
तुम खिलते ही जाना, खिलते ही जाना.....

देवेन्द्र "सागर"

Saturday, April 26, 2014

सितमगर



      वो सितमगर सितम करता गया, करता गया
      मैं महोबत में सहती गई, सहती गई .......

      बो मुझसे बदुआ कहता गया, कहता गया
      मैं उसके लिए दुआ करती गई, करती गई ....

      बो अपने जुल्मो से मुझे डराता गया, डराता गया
      महोबत रुसबा ना हो मेरी इसलिए मैं डरती गई,
      डरती गई ......

      क्या करती बड़ी सिद्दत से चाहती थी उसको
      बो पल-पल मारता गया मैं मरती गई, मरती गई .....

      देवेन्द्र "सागर"
      २३-०२-२०१४ 

"माँ"

   


     अपने रक्त से सीच कर
     प्राणदान देती माँ
     खुद सारे कष्ट सहती माँ
     कष्टों में हँसते हँसते रहती माँ
     मुख से कुछ न कहती माँ
     समझ ना आये बो जज्बात है माँ
     कही-अनकही बात है माँ
     मुसीबतों में साथ है माँ
     खुशियों की वर्षात है माँ
     प्यार-दुलार की सोगात है माँ
     जीवन के अंधियारे में
     पूर्णिमा की रात है माँ

     देवेन्द्र "सागर"
     २६-०४-२०१४


भारत का बलवीर

 
 

     मेरी शमसीर बहुत पुरानी है
     ये जंग की दीवानी है
     इसके विजय के बहुतेरे किस्से है
     इन किस्सो का हिस्सा मैं बन जाउगा
     मैं भारत का बालवीर हूँ
     भारत माँ का मान बढाँउगा .....

     नहीं ये किसी कि दासी है
     शिवाजी और वीर प्रताप के
     हाथो कि ये आदी है
     दुश्मनो का रक्त चढ़ाकर
     इसकी प्यास बुझाऊगा
     मैं भारत का बालवीर हूँ
     भारत माँ का मान बढाँउगा ......

     जो धरे नापाक कदम
     मेरी पुण्य बसुन्धरा पर
     ले शमसीर हाथो में
     सामने अड़ जाउगा
     खीच म्यान से शमसीर दुधारी
     दुश्मनो के शीश धड़ से
     अलग गिराऊगा
     मैं भारत का बालवीर हूँ
     भारत माँ का मान बढाँउगा .......

     रन-भूमी के वीर समर का
     इतिहास नहीं अभी पुराना है
     राष्ट्र की खातिर लड़ी समर मै
     उन देवीयों को भुला नहीं जमाना है ......

     देख सहास दुर्गावती का
     अकबर भी थर्राया था
     रानी अवंती बाई जब उतरी रन में
     कैप्टन वेडिंगटन चकराया था
     घोड़ो कि टापो से उसे
     खूंद-खूंद भगाया था
     लक्ष्मी  बाई जब लड़ी समर में
     दिखा कला शमसीर की
     अंग्रेजो का होस उड़ाया था .....

     जीते जी नहीं दिया राज्य अपना
     बलदानी परम्परा को निभाया था
     त्याग प्राण खुद ही अपने
    भारत माँ का मान बढ़ाया था ....

     उन्ही माताओ का दूध रगो में
     खोल रहा है लहू बन कर
     उस दूध कि लाज निभाउगा
     मै भारत का बालवीर हूँ
    भारत माँ का मान बढाँउगा.....

    देवेन्द्र " सागर "